…और वह लस्सी बेचकर ही कमाने लगा है लाखों रूपए
आज लखनऊ में स्वावलंबी भारत अभियान की कार्यशाला में हूं। एक के बाद एक युवा अपनी सफल गाथाएं सुना रहे थे।
उन्हीं में से एक दीपक यादव से मैंने बातचीत की “कब से शुरू किया तुमने यह लस्सी बेचने का काम?”
उसने बताया “सर!मैं गोरखपुर का रहने वाला हूं वहां से 60 किलोमीटर दूर मेरा गांव है, M.A. पॉलिटिकल साइंस में पढ़ रहा हूं,विद्यार्थी परिषद का उपाध्यक्ष हुं। मैंने गांव से दूध लाकर व दही बनाकर बेचना शुरू किया।शुरू में तो बहुतों ने मजाक उड़ाया पर मेरी घर की जरूरत थी।”
“एक ठेला लगाया अपने ही कॉलेज के सामने। ऊपर नाम लिखा, स्टूडेंट लस्सी. धीरे धीरे मेरी लस्सी अच्छी बिकने लगी। कुल्हड़ में बेचता हूं ₹30 में 180ml.” “फिर हमारी एक प्रोफेसर मैडम हैं वह होम साइंस की हैं,स्वदेशी की कार्यकर्त्री हैं। उन्होंने मुझे अलग-अलग टेस्ट की लस्सी बनाकर बेचने का सुझाव दिया। जैसे चॉकलेट लस्सी, स्ट्रौबरी लस्सी, खोया लस्सी आदि। अब मैं 11 प्रकार की लस्सी बेचता हूं।
मैंने पूछा “कठिनाई नहीं आई कोई?”
उसने कहा “हां करोना ने बहुत मार मारी।मैं भारी घाटे में चला गया। पर मैंने हिम्मत नहीं छोड़ी।अब दोबारा से सब ठीक कर लिया है। सात ठेले और एक दुकान खोल ली है। इन पर 29 लड़को को काम दिया है।₹10लाख हर महीने की सेल है। और मैं अभी नेट क्लियर करने की तैयारी भी कर रहा हूं।”
मैंने फिर पूछा “आगे की क्या सोच है?”
तो उसने कहा “सर! 5 साल में 10 करोड़ का बिजनेस मेरा हो जाएगा। सारे देश में स्टूडेंट लस्सी का ब्रांड, फ्रेंचाइजी मॉडल पर चला दूंगा।”
मैंने उसको जमके शाबासी दी। और कहा “तुम नए बिट्टू टिक्की वाला हो।तेरे जैसे युवा ही भारत को पूर्ण रोजगार युक्त व गरीबी मुक्त,समृद्धि युक्त करेंगे।”~सतीश कुमार
नीचे: स्टूडेंट लस्सी बेचने वाले दीपक यादव के साथ चर्चा करते हुए।