…और हमने पहली बार कुली से सामान उठवाया!
परसों नागपुर में स्वदेशी जागरण मंच की राष्ट्रीय परिषद पूरी करके हम हजरत निजामुद्दीन स्टेशन पर उतरे। काफी पुस्तकें व अन्य सामान मिल गया था,इसलिए हमारे पास 6 नग हो गए थे।तीन बड़े थे, भारी थे। प्लेटफॉर्म भी अंतिम 9 न: था।
स्वाभविक रूप से कुली वहां थे उनमें से एक आ गया बोला “हां! बाबू जी! उठाऊं सामान, ₹200 लगेंगे?”
अब आज तक जिंदगी में कुली नहीं किया तो हमने मना करना ही था। कश्मीरी लाल जी तो कभी मानते नहीं। पर मैंने सोचा कि “सामान ज्यादा है यह तो बड़ी बात नहीं है पर इस कुली को भी कुछ पैसा मिल जाए तो क्या हर्ज है?”
तब मैंने कहा “भाई ₹200 बहुत ज्यादा है?”
तो वह बोला “साहब! हमारी कोई तनखा तो है नहीं हमने भी बच्चे पालने हैं।आप बड़े लोग हो, क्या फर्क पड़ता है?”
फिर उसने मेरे यह कहने पर कि “इतने में तो मुझे बड़े बाबू जी इजाजत नहीं देंगे।”
उसने कहा “अच्छा 180 दे देना।” मैंने कश्मीरी लाल जी की तरफ देखा। जो पहले तो मना कर रहे थे पर कुली का वाक्य सुनकर तैयार हो गए।और हम जीवन में पहली बार कुली से सामान उठवा कर बाहर आए।उसका वाक्य “हमने भी बच्चे…” अभी तक कान में गूंज रहा है।
फिर आज ही मैंने केरल के श्रीनिवास के बारे में पढ़ा जो एर्नाकुलम में कभी कुली का काम करता था स्टेशन पर ही पढ़ाई कर, वहां की वाईफाई का उपयोग कर, आईएएस की परीक्षा पास कर गया।शाबास!श्रीनिवास। उसी का नीचे चित्र दिया है।~सतीश कुमार
साथ में, नागपुर राष्ट्रीय परिषद में अधिकारियों के कुछ फोटो