कल जब मैंने प्रत्यक्ष भारत माता से बातचीत की!
मैं कल राजस्थान के सवाई माधोपुर में था। वहां नगर से 12 किलोमीटर दूर एक ग्रामीण विद्यापीठ चलता है,जिसे बहन अर्चना मीना जी का परिवार चलाता है। कॉलेज की लगभग 170..180 लड़कियां बैठी थी।
मैंने बात शुरू की और पूछा की “कितनी ऐसी हैं जिन्होंने जयपुर नगर नहीं देखा,जो केवल 120 किलोमीटर दूर है?”
25 से 30 ने हाथ खड़े कर दिए, सभी हैरत में पड़ गए।
फिर मैंने पूछा “आज तक रेल में नहीं बैठी?”
ऐसी भी 10..12 थी।
मेरे प्रश्न जारी थे “मेट्रो नहीं देखी उसमें नहीं बैठी?”
ऐसी तो अधिकांश थी।
फिर मैंने उनको देश, समाज, धर्म से जुड़े कुछ प्रश्न पूछे।
अपनी समझ से उन्होंने उत्तर दिए। वह सामान्यता जनजातीय क्षेत्र की लड़कियां हैं।इसलिए आर्थिक विपन्नता भी है। साइकल भी घर में है नहीं। उनकी ड्रेस उनकी घर की स्थिति बता रही थी। पर वे हंसते हंसते उत्तर दे रही थीं। सरलता अपनापन टपक रहा था। मैं उस समय तक अंदर से रोमांच से भर उठा था “यही है मेरी भारत माता!!! यही है मेरा दरिद्र नारायण!!”
जब बात समाप्त कर चलने लगा,तो मैंने सामने बैठी बच्ची की आंखों में देखा।मानो कह रही थी “अंकल रुक जाओ न? हमारे से थोड़ी देर और बात करो न?। हमारी विपन्नता, बेरोजगारी को दूर करने के लिए क्या सोचते हो बताओ न?
लेकिन मैं आंख चुरा कर निकल आया।
और वहां से आने के बाद मुझे केवल एक पछतावा हो रहा है कि मैंने केवल 1 घंटे उनसे बात क्यों की? मुझे तो सायंकाल तक वहीं रुकना चहिए था।
खैर!मैंने उन्हें आगे बढ़ने के, जिंदगी में बड़े काम करने के, बड़े सपने देखने का आग्रह किया।
मैंने उनकी निदेशिका रचना जी से आग्रह किया कि इन बच्चियों को जल्दी जयपुर दिखाओ,रेल और मेट्रो की सवारी कराओ। उन्होंने मुझे आश्वस्त किया।वहाँ एक रोजगार सृजन केंद्र का उद्घाटन तो कर ही दिया।~सतीश कुमार
नीचे:गत दिनों राजस्थान के रणथंबोर अभ्यारण्य जाना हुआ। वहां बड़े निकट से जंगल के राजा(टाइगर) के दर्शन हुए। स्वदेशी चिठ्ठी के पाठकों हेतु निकट से मैंने फ़ोटो खींचे।