आज सवेरे ही मैं कोयंबटूर(तमिलनाडु) पहुंचा। सीधे वहां के संघचालक जी के घर गया। उन्होंने जो समाचार अपने उद्योग के बारे दिया वह सुनकर मैं गदगद हो उठा। उन्होंने कहा “सतीशजी! मैं टेक्सटाइल की पिंडल(चरखी) बनाकर एक्सपोर्ट करता हूँ और चीन को ही 10 से 12 करोड़ का प्रति वर्ष का मेरा एक्सपोर्ट है।मेरी कंपनी #सिमटा का चीन में नाम चलता है।”
फिर मैंने अपने स्वदेशी के संगठक सत्यनारायण जी से पूछा “कोयंबटूर बड़ा इंडस्ट्रियल एरिया है यहां पर उत्तर पूर्व भारत के कितने लोगों को रोजगार मिलता होगा?”
उन्होंने जो उत्तर दिया तो मैं अवाक रह गया।
वह बोले “कम से कम 7 लाख लोग बिहार, बंगाल उड़ीसा आसाम से आकर यहां रोजगार पाते हैं। यह लघु और मध्यम उद्योगों का भारत के सबसे बड़े केंद्रों में से है। यहां से कोई 10से 11 हजार करोड़ का प्रतिवर्ष का एक्सपोर्ट भी होता है।पम्प इंजन, टेक्सटाइल के पार्ट्स व अनेक प्रकार के छोटे बड़े उद्योग यहां हैं।”
मेरे मन में आया अगर हर प्रांत में एक कोयंबटूर हो जाए,तो फिर हमारे भारत की,रोजगार की बात ही बन जाए।न माइग्रेशन हो न रोज़गार की कमी।
फिर वहीं पर ही सद्गुरु जग्गी वासुदेव द्वारा स्थापित ईशा फाउंडेशन है। यहां सबसे बड़ी शिव की मूर्ति है। तमिलनाडु जहां हिंदू, हिंदुत्व का बड़ा विरोध होता रहा है वहां पर हिंदुत्व का ऐसा विराट केंद्र खड़ा कर दिया, सदगुरु ने।प्रतिदिन हजारों तीर्थयात्री वहां आते हैं।
जो नगर अपने देश के सात लाख से अधिक बहिनों, भाइयों को रोजगार दे रहा हो उसे आधुनिक तीर्थस्थल ही कहना चाहिए,क्यों ठीक है न बात?~सतीश कुमार
नीचे:ईशा फाउंडेशन में शिव की मूर्ति के सामने अपने संगठक सत्यनारायण जी के साथ।