…पिछले दिनों दो दधीचि ऋषियों के दर्शन हुए!!
*दो दिनों से कलकत्ता में प्रवास पर था।वहां कार्यालय में केशव जी के दर्शन हुए।वे वरिष्ठ प्रचारक हैं।96 वर्ष आयु है। मैं श्रद्धा से भरकर उनके पास बैठा। उन्होंने मेरा पूरा परिचय पूछा।
फिर मैंने उनसे पूछा “कितने वर्षों से प्रचारक हैं?”
वे बोले “1950 में नागपूर से हम 9 प्रचारक इस तरफ आए,आसाम, उड़ीसा बंगाल आदि हेतु…मेरा क्षेत्र यहां कलकत्ता में तय हुआ।…और आज तक।”
मैंने आश्चर्य जताया “याने आपका 72 वर्ष का प्रचारक जीवन यहीं बंगाल में ही निकला।”
वे बोले “निकला मतलब?”
मैं झेंपा।वे संघ, बंगाल, बंगाली भाषा, सब एक हो गए हैं।जब 1950 में आए थे तो सब शून्य था।आज बंगाल में संघ,स्वदेशी,भाजपा हिंदुत्व,राष्ट्रवाद… सब मजबूती से आगे बड़ रहे हैं।
*15 दिन पहले केरल में था।कोच्चि में ऐसे ही 92 वर्षीय प्रचारक रंगाहरी जी मिले। कोच्चि पहुंचा तो शाम को,पर दर्शन करने उनके कमरे में अगले दिन सुबह ही पहुंचा। डांट तो पड़नी ही थी। वे न केवल सजग हैं बल्कि अभी भी लेखन अध्ययन जारी है।परिश्रम पूर्वक लेखन,पुराने कार्यकर्ताओं की संभाल। सब जारी है।
केरल और बंगाल वामपंथी पार्टियों के गढ़ रहे हैं।इन दोनों ने,और इन जैसे कितने प्रचारकों कार्यकर्ताओं ने अपने को तिल तिल खपाया। तब न कोई कार्यालय थे, न पैसा न भोजन की कोई पक्की व्यवस्था। मान सम्मान का तो कोई प्रश्न ही नहीं। सब सहकर इन्होंने संगठन खड़ा किया, तपस्या की तो आज भारत में हिंदुत्व का शंखनाद हो रहा है।
दधीचि ऋषि ने अपनी हड्डियां देकर देवताओं को बचाया। मैं सोच में था,की मैंने कम से कम ऐसे दो दधीचि ऋषियों को प्रत्यक्ष अपनी आंखो से इन्हीं दिनों देखा, धन्यत्ता का अनुभव किया।~सतीश कुमार
नीचे: कलकत्ता कार्यालय में केशव जी के, व केरल में रंगहरी जी के साथ।शायद ये मेरे सबसे उत्तम फ़ोटो हैं।