गोपबंधु दास जीवनी Biography of Gopu Das in Hindi Jivani

गोपबंधु दास प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी, पत्रकार, कवि तथा साहित्यकार थे। ये उड़ीसा के प्रख्यात सामाजिक कार्यकर्ता थे। गोपबंधु दास को ‘उत्कल मणि’ के नाम से भी जाना जाता है। उड़ीसा राज्य में जब भी राष्ट्रीयता और स्वाधीनता संग्राम की बात की जाती है, तब लोग गोपबंधु दास का ही नाम लेते हैं। उड़ीसा के लोग इन्हें ‘दरिद्र सखा’ अर्थात् ‘दरिद्र के सखा’ के रूप में याद करते हैं। गोपबंधु दास ने उत्कल के विभिन्न अंचलों को संघठित करके पूर्ण उड़ीसा राज्य बनाने की जी-जान से कोशिशें की थीं। उत्कल के दैनिक पत्र ‘समाज’ के ये संस्थापक थे।

जन्म तथा शिक्षा

गोपबंधु दास का जन्म 9 अक्टूबर, 1877 को उड़ीसा के पुरी ज़िले में साक्षी गोपाल के निकट सुआंडो नामक गाँव में हुआ था। इनके पिता का नाम दैतारि दास तथा माता का नाम स्वर्णमायी देवी था। इनका सम्बन्ध एक ग़रीब ब्राह्मण परिवार से था। गोपबंधु दास ने पुरी, कटक तथा कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) में शिक्षा ग्रहण की थी। इन्होंने कोलकाता विश्वविद्यालय से सन 1906 में एल. एल. बी. की डिग्री प्राप्त की।

क्रांतिकारी गतिविधियाँ

शिक्षा पूरी करने के बाद गोपबंधु दास आजीविका के लिए वकालत करने लगे। वे जीवन पर्यंत शिक्षा, समाज सेवा और राष्ट्रीय कार्यों में संलग्न रहे। राष्ट्रीय भावना इनके अन्दर बाल्यकाल से ही विद्यमान थी। गोपबंधु दास विद्यार्थी जीवन से ही ‘उत्कल सममिलनी’ संस्था में शामिल हो गये थे। इस संस्था का एक उद्देश्य सभी उड़िया भाषियों को एक राज्य के रूप में संगठित करना भी था। उन्होंने इसे स्वतंत्रता संग्राम की अग्रवाहिनी बनाया। जब महात्मा गाँधी ने ‘असहयोग आन्दोलन’ प्रारम्भ किया’ तब गोपबंधु दास ने अपनी संस्था को कांग्रेस में मिला दिया।

जेल यात्रा

गोपबंधु दास उड़ीसा में राष्ट्रीय चेतना के अग्रदूत थे। स्वतंत्रता संग्राम में उन्होंने अनेक बार जेल की यात्राएँ कीं। 1920 की नागपुर कांग्रेस में उनके प्रस्ताव पर ही कांग्रेस ने भाषावार प्रांत बनाने की नीति को स्वीकार किया था। उड़ीसा राष्ट्रवाद के वे श्रेष्ठ पादरी बन गए थे तथा 1921 में उन्होंने उड़ीसा में ‘असहयोग आंदोलन’ की अगुवाई की। उन्हें दो वर्ष की कैद हुई। गोपबंधु दास लाला लाजपत राय द्वारा स्थापित ‘सर्वेन्ट ऑफ दी प्यूपल सोसायटी’ के भी सदस्य बने थे।

स्कूल की स्थापना

वर्ष 1909 में गोपबंधु दास ने साक्षी गोपाल में एक हाई स्कूल की स्थापना की। यह विद्यालय शांतिनिकेतन की भाँति खुले वातावरण में शिक्षा देने का एक नया प्रयोग था।