पेरीस ने बदली दी पेरीन की दिशा और कूद पड़ीं स्वतंत्रता आंदोलन में –  YuvaPress

पेरीन बेन पहले क्रांतिकारी और बाद में गाँधी जी की अनुयायी थीं। ये देश की स्वतंत्रता के लिए काम करती थी। 1930, 1932 में पेरीन बेन को गिरफ्तार करके जेल में डाल दिया गया था। मुंबई प्रदेश कांग्रेस की संघर्ष समिति की वे प्रथम महिला अध्यक्ष थीं। पेरीन बेन ने ‘गाँधी सेवा सेना’ के सचिव के रूप में काम किया था। स्वतंत्रता के आरंभिक वर्षों में राष्ट्रपति द्वारा पेरीन बेन ने ‘पद्मश्री’ से सम्मानित किया गया था। 

क्रांतिकारी पेरीन बेन का जन्म 12 अक्तूबर, 1888 ई. को कच्छ रियासत के मांडवी कस्बे में हुआ था। वे दादा भाई नौरोजी की पौत्री थीं। भारत में शिक्षा प्राप्त करने के बाद आगे के अध्ययन के लिए वे पेरिस गईं। इस प्रवास ने उनके जीवन की दिशा मोड़ दी।

पेरीन बेन पेरिस में मदाम भीखा जी कामा, लाला हरदयाल, श्यामजी कृष्ण वर्मा जैसे क्रांतिकारियों के संपर्क में आईं और देश की स्वतंत्रता के लिए काम करने लगी थीं। पुर्तग़ाल के समुद्र तट पर जहाज़ से कूदने पर वीर सावरकर को गिरफ्तारी से बचाने के प्रयत्न में पेरिन बेन भी सम्मिलित थीं। 1911 में पेरीन बेन भारत आईं और उन्हें यहां अंग्रेज़ों के हाथों भेदभाव का बड़ा अपमानजनक अनुभव हुआ। 1919 में पेरीन बेन की महात्मा गाँधी से भेंट हुईं और वे गाँधी जी की अनुयायी हो गईं। 

पेरीन बेन ने खादी के वस्त्र अपनाए, खादी के प्रचार और हरिजन उद्धार के कार्यों में जुट गईं। स्वदेशी का प्रचार, मद्य निषेध और महिलाओं को संगठित करना पेरीन बेन के प्रिय विषय थे। 1930, 1932 में उन्हें गिरफ्तार करके जेल में डाल दिया गया था। पेरीन बेन ने ‘गाँधी सेवा सेना’ के सचिव के रूप में काम किया और 1935 में स्थापित ‘हिन्दुस्तानी प्रचार सभा’ के काम में भी जुड़ी रही थीं।

स्वतंत्रता के आरंभिक वर्षों में राष्ट्रपति द्वारा पेरीन बेन को पद्मश्री से सम्मानित किया गया था।

17 फरवरी, 1958 को पेरीन बेन का देहांत हो गया।