वीर सिंह के साथ

कल जब मैं रोहतक में बैठक सम्पन्न कर कक्ष से बाहर निकला तो गुरूग्राम के महानगर संयोजक विक्रम जी अपने एक कार्यकर्ता का हाथ थामे मेरे पास लाए व कहने लगे “सतीश जी आपने बड़े उदाहरण तो बताए एक छोटी कहानी तो हमारे छायसा गावं के वीरसिहं जी की भी है…आप सुनोगे?” मैंने कहा ” क्यों नहीं सुनूँगा?इतना नहीं, अच्छी लगी तो आगे भी सुनाऊँगा!!” फिर मैंने उसकी तरफ़ देखा तो वह बताने लगा “मैं फ़ौज मे जाना चाहता था, पर किसी कारण रह गया! मेरा परिवार मेवात का एक बहुत सामान्य किसान परिवार है,ज़मीन भी बहुत थोड़ी! क्या काम करूँ? तो किसी कि सलाह पर आटो चलाना ही शुरू किया!कुछ महीने चलाया तो अधिक कमाई करनी चाहिए,इस विचार से एक दूसरा आटो फ़ाइनैंस कराकर एक ड्राईवर रख लिया…फिर मेरे दिमाग़ में आया कि एक ही क्यों? ज़्यादा क्यों नहीं? कुछ घर से,कुछ मित्रों से पैसा जुटाया और 7-8आटो फ़ाइनैंस कर लिए!आज मेरी 30-31 गाड़ियाँ चलती हैं!कुछ फाइनांस पर,कुछ किराए पर! और अब तो मैंने गुड़गाँव में ओला कंपनी के साथ टाइअप कर कुछ मोटरसाइकिल भी डाल ली हैं…प्रभु की कृपा है…कह सकता हूँ कि मेरे सहयोग से 36-37 लोग ख़ुशी से काम में लगे हैं वे तो कमा ही रहे हैं,मुझे भी अच्छी बचत हो रही है” मैंने कहा “यही होनी चाहिए स्वदेशी कार्यकर्ता की सोच,कि मैं हर किसी का फ़ायदा करू,रोजगार दिलाऊँ तो आपकी उन्नति स्वभाविक होगी..प्रकृति का नियम है-Action n Reaction are equal n opposite भला करो तो तुम्हारा भला होगा ही..यही है सच्ची सफलता…