जम्मू में स्वदेशी सम्मेलन, मंच पर अश्वनी जी(संघ,अधिकारी) पवन बड़ू व प्रांत संयोजक प्रो:आशुतोष! अम्बाला में परिवार के बच्चों के साथ!
मै परसों अम्बाला में अपने विवेक सचदेवा जी के घर रुका। नवरात्रों के चलते मेरे को साबूदाना की खीर खिलाई जाये…ऐसा विवेक जी ने अपनी पत्नी से कहा। पर उन्हें बनानी नहीं आती थी,कभी बनायी भी नहीं थी।
किन्तु थोड़ी देर बाद ही वह बहनजी बहुत अछि खीर बना लायी…मैने आश्चर्य से इसका राज़ पूछा?
तो वह बोलीं “इसमें क्या है,मैने तुरंत यूट्यूब पर सर्च किया,और उसके हिसाब से तैयार कर दी”
रात को मैने उन्हें बुलाया और कहा “मेरे फोन की दूसरी सिम काम नहीं कर रही।तो उन्होंने अपने 6टी में पड़ते बेटे को बुलाया,और मेरे से कहा “ये फ़ोन आदि का बड़ा एक्सपर्ट है, और मेने देखा वास्तव में वह था।
अगले दिन कश्मीरी लाल जी ने अपने वैलेट में पैसे डलवाने को कहा तो,एटीएम से पैसे निकालने को कहा तो, पेट्रोल पम्प वाले को डिजिटल पेमेंट करनी थी तो..सब मामलों में वो तज्ञ था।
किन्तु अगले दिन मैने उनके दोनों बच्चों को बैठा लिया, और पूछा “राम,लक्ष्मण भाइयों के नाम क्रम से बताओ?” अब उनके उत्तर आगे पीछे होंने लगे!
मैने पूछा सम्पाती कौन था? लक्षमण की पत्नी का नाम बताओ? क्योंकि उनके दादाजी गाँव में रामलीला करवाते है.. इसलिए मुझे अपेक्षा अधिक थी।
बाद में मैने विवेक जी व बहिन जी से बात की “उन्हें मोबाइल, कंप्यूटर जरूर सिखाओ…पर ये सब बातें भी तो बताओ? मैने कहा “अछी पढ़ाई, अछि टेक्नोलॉजी बच्चों को सिखाना अपना काम है, पर अछे संस्कार देना,अपने धर्म,अपना उच्च व्यवहार सिखाना भी तो हमारा काम है, है या नहीं?” उन्होंने माना, मानना ही था!
कल मै जम्मू में था, वहां एक बहनजी कहने लगी “क्या करें भाई साहेब,आजकल के बच्चे ऐसी बातें सुनते ही नहीं। मै सोच में था..
तभी थोड़ी देर बाद एक घटना हुई। एक कार्यकर्ता मुझे कार्यालय छोड़ने कार में जा रहे थे,पिछली सीट पर कक्षा 10 में पड़ने वाली उनकी बेटी बैठी थी।
उसने अपने पापा को कहा “अरे यार,मुझे पहले मेरे ट्यूशन सेंटर पर छोड़ो।” मै चोंका, और उस बेटी से कहा ” पापा को ऐसे बुलाना चाहिये क्या? क्या वे तुम्हारे क्लासमेट हैं, या छोटी उम्र के दोस्त?”
इस पर वह तुरंत अपनी ग़लती मान गई। और उसने मुझसे कहा “मुझे पहले किसी ने यह ध्यान नहीं कराया। मेरा प्रोमिस है आज के बाद पापा या मम्मी को ठीक से ही बोलूँगी।”
मेरा अनुभव है की बच्चों को अगर प्यार से समझाया जाये,तो बच्चे न केवल मानते हैं,बल्कि उन्हें यह अच्छा भी लगता है।
हम कई बार इन विषयों पर या तो ध्यान ही नहीं करते या फिर केवल डाँटते हैं, फिर कहते हैं की बच्चे सुनते ही नहीं।
जबकि प्यार से,सजगता से जब हम बच्चों को संस्कार देते हैं तो वे माँ बाप या बड़ों की इज्जत भी ज्यादा करने लगते हैं…जरा कर के देखिये!!
(कल व आज हिमाचल व जम्मू के प्रांत सम्मेलन हुए,जिनके बारे में कल की चिट्ठी में पढिए!)