दिल्ली कार्यालय पर हम चारों प्रचारक

चाँदनी चौंक के अपने कार्यकर्ता का फ़ोन आया, मैं समझा कल जो उसने कार्यालय पर 4 महँगी कुर्सियाँ भिजवाई थीं,उनके बारे में कहता होगा!पर 10मिन्ट की बात में उसने कहीं ज़िक्र तक नहीं किया! शाम को फ़रीदाबाद के दोनों प्रमुख कार्यकर्ता आए तो दो जोड़ी कुर्ता पायजामा(बढ़िया )सिला हुआ दे गए और किसी से कोई ज़िक्र तक नहीं! ऐसे ही फ़रीदाबाद के एक दूसरे कार्यकर्ता ने दो बड़ी अलमारियाँ भिजवा दीं और फ़ोन तक नहीं !! मुझे ध्यान नहीं आ रहा गत 8-10 वर्षों में जूते-कपड़े से लेकर मोबाईल तक कभी ख़रीदा हो…कार्यकर्ता समय से पहले अपने से ध्यान कर दे जाते हैं,वह भी चुपचाप! एक और बात: अभी रैली की चर्चा करने गत सप्ताह तीन प्रमुख कार्यकर्ता आए! उनके एक-दो उतरों से असंतुष्ट हो मैं बिफ़रा “ठीक है जाओ…तुम से न बन पड़ेगा” मेरे कर्कश स्वर को सुन वे सहम कर कमरे से चले गए, शाम को मुझे गल्ती का एहसास हुआ तो मैंने एक को फ़ोन किया, पर यह क्या.?.”नहीं-नहीं सतीश जी..असल में गल्ती तो हमारी थी…हम सुस्ती कर रहे थे…आपकी डाँट से तो बल्कि ठीक हुआ..” उसकी बात सुनकर मैं सोचने लगा धन्य हैं हमारे कार्यकर्ता …सब सहनकर, पूरे समर्पण भाव से चुपचाप,दिन-रात काम करते हैं! ऐसे स्वदेशी कार्यकर्ताओं का अभिनंदन