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हमारा परिवार की परसों गुरुग्राम में हुई बैठक। व दिल्ली में स्वदेशी भवन निर्माण हेतु एक लाख का चेक डा. अश्वनी महाजन को सौंपते हुए सह कोष प्रमुख सतपाल जी, साथ में कमलजीत जी।

कल मैं सवेरे कश्मीरी लाल जी को स्टेशन के लिये छोड़ सैर करता हुआ आ रहा था। तभी सड़क के मोड़ पर मैंने देखा। एक 19-20 वर्ष के हट्टे-कट्टे युवक को जो हाँफ रहा था व अपनी बहन को, जो दुबली पतली थी (21-22 वर्ष की होगी) कह रहा था, “बस-बस और बिल्कुल नहीं दौड़ पाऊंगा, मुझे चक्कर आने लगे हैं।” पर वह भी अड़ी थी, “थोड़ा धीरे दौड़ सकता है पर दौडना तो पड़ेगा।” फिर उसने साथ ही चल रहे, पापा को देखा की वे उसे कहें। पापा बोले, “अरे, जाने दे, वह कह रहा है, चक्कर आ रहे हैं।” “आप चुप रहो पापा। इसका रोज कोई न कोई ड्रामा होता है। कभी पेट दर्द हो जाता है तो कभी चक्कर। कुछ नहीं, सब बहाने हैं।” मैं 4-5 मीटर दूरी पर कुछ इस तरह चल रहा था, की उन्हें न लगे कि मैं ध्यान से सुन रहा हूँ। पापा भी हथियार डाल गए। “तेरी टी शर्ट अगर पसीने से न भीगी न, तो आज नाश्ता नहीं मिलेगा।” बहन बोली। “कुछ समझती तो हो नहीं…” कह, रोता चेहरा बना वह थोड़ा मोटा युवक बड़बड़ाते हुए फिर दौड़ने लगा। मैं समझ गया, वास्तव में वह चाहती थी कि वो रोज दौड़े, ताकि उसका मोटापा दूर हो, युवक सुस्ती करता होगा। मैं चिंतन करने लगा, “हमारे यहाँ कितना जबर्दस्त पारिवारिक भाव है। वह लड़की अपने युवा भाई से उसकी इच्छा के विरुद्ध दौड़वा रही थी, पिता को भी स्नेह अधिकार से डांट रही थी। लेकिन दोनो (बाप-बेटा) उसकी डांट खाकर भी आनंद का अनुभव कर रहे थे।