एक व्यक्ति देश का प्रधानमंत्री होकर 67 वर्ष की आयु में भी मां को पैर छूकर ही प्रणाम करता है!
दूसरा केवल एक पार्टी के अध्यक्ष बनने पर,मां को माथे पर चूम रहा है!
अपने वरिष्ठ प्रचारक इंद्रेश जी
कल जब मैं मुंबई से आ रहा था तो ट्रेन में सामने वाली सीट पर एक परिवार बैठा था उनके पास छोटा उनका बच्चा था। मैं उससे खेलने लगा, मैंने उससे पूछा क्या नाम है तुम्हारा? वह बोला “दुष्यंत” मैंने पूछा “दुष्यंत कौन हुए तुम्हें मालूम है? तो बच्चा अपने मां पिता जी की तरफ देखने लगा मैंने उनकी तरफ देखा तो उन्हें भी शायद दुष्यंत की कथा मालूम नहीं थी! तो मैंने कहा “यदि आप को दुष्यंत और उसके पुत्र भरत जिसके नाम पर भारत देश का नाम है इसकी कथा नहीं पता तो आप बच्चों को क्या बताएंगे?” जब वह परिवार मथुरा में उतरने लगा तो बच्चे की माँ बोली “चलो दुष्यंत,दादू को हैलो कहो!” मैंने कहा “बहनजी मैं इसका छोटा भाई हूं क्या?” तो बेचारी मेरा मुंह देखने लगी!मैंने कहा “उससे कहो,दादा जी को प्रणाम करो,यह ‘दादू से हैंडशेक का संस्कार’, बच्चे को दुष्यंत नहीं बनाएगा, यह बच्चे को कोई डेविड या जोहन बनाएगा” दोनों पति पत्नी ने मेरी बात को स्वीकारा और उतर गए।
संस्कार कैसे होते हैं।ऊपर जो चित्र दिया है, एक व्यक्ति देश का प्रधानमंत्री होकर 67 वर्ष की आयु में भी मां को पैर छूकर ही प्रणाम करता है!दूसरा केवल एक पार्टी के अध्यक्ष बनने पर,मां को माथे पर चूम रहा है! एक का संस्कार इस देश की मिट्टी का है और दूसरे का..?
अपने वरिष्ठ प्रचारक इंद्रेश जी,जब प्रचारक निकले तो उनके माता-पिता ने बाकायदा एक निमंत्रणपत्र छपवाकर सारे समाज को बुलाया,जैसा एक विवाह के समय करते हैं!उस समय पर उन्होंने खड़े होकर कहा “यह हमारा सौभाग्य है कि हमारा पुत्र इंद्रेश, संघ का प्रचारक जाने के लिए तैयार हुआ है आज हम उसको संघ और समाज को सौंप रहे हैं” और इंद्रेश जी जीवन भर के लिए प्रचारक निकल गए। उनको यह संस्कार, उनको यह विचार प्रथम रुप से परिवार से ही आया!हम बचपन में बच्चों को कैसा संस्कार देते हैं, कैसा व्यवहार करते है, यह उसके भविष्य का पूरा जीवन निर्धारण करता है!इस और हम कितने सजग हैं…जरा सोचें!!