परसों जब मैं रोहतक में माता कैलाश देवि से मिला तो मैं सोच में पड़ गया कि ये कर्ण की वंशज ही होंगीं ! दो दिन पूर्व ही जब संघ के कार्यकर्ता उनसे मिलने गए तो माता जी ने कहा “ये मेरी सोने की चूड़ियाँ ले जाओ,वनवासी महिलाओं व बच्चों की सहायता में लगा दो” वे रोहतक जिले की DEO(District education officer) रही हैं!
रोहतक में संघ के अधिकारियों सुभाष जी व रविन्द्र जी ने बताया कि माता जी सेवानिवृत्ति के बाद से सेवाकार्यो हेतू लाखों नहीं शायद करोड़ रूपये से अधिक दे चुकी हैं! यही नहीं वे मेरे से बोलीं “मुझे स्वर्गीय पति की व अपनी 70,000रूपये के लगभग पेंशन मिलती है, मैं अपने पर न ख़र्च कर ऐसे ही कामों के लिए दे देती हूँ !” “पर क्यों?” मेरे पूछने पर वे बोलीं “ये तो परमात्मा से पूछो-कि क्यों वो मेरे हाथों से सेवाकार्यों में देने के लिए पैसा भेजता है? मैं निरूतर!! उन देवि के चरण स्पर्श कर निकला तो मुनि हरमिलापी जी का भजन स्मरण हो आया-“प्रभु जी तुम बड़े दयालु हो..तेरा किसे भेद न पाया है”…