कल दिल्ली के डा:भीमराव अम्बेडकर इन्टरनैशनल सैन्टर दिल्ली में रगांहरि जी के साथ!
रंगाहरि! संघ के वरिष्ठ प्रचारक! मुझे जैसे ही दूर से उन्होने देखा(अम्बेडकर सैन्टर दिल्ली में)और बुलाया..”अरे,सतीश! इतने दिनों बाद,ठीक हैं?
उनके मिठास व अधिकार से भरे शब्दों ने कई दिनों की मानों थकावट एक साथ उतार दी हो! मेरे हाथ अनायास ही उनके पैरों को छू गए! मानों सगे दादाजी मिले हों! या फिर…
नई पीढी नहीं जानती होगी,उनके बारे में ज्यादा! अत: सोचा,आज स्वदेशी-चिट्ठी के माध्यम से ही बता दूं, अपने बंधुओं,भगिनीयों को!
केरल के रहने वाले ,वहीं से प्रचारक निकले! जिला,विभाग,प्रान्त प्रचारक रहने के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय बौद्धिक प्रमुख रहे…और अब बिना दायित्व के भी उतना ही काम ! जितना युवावस्था व अखिल भारतीय दायित्व पर होते हुए करते थे! क्योंकि उनके लिए संघकार्य ये दायित्व या आयु का नहीं साधना का विषय है!
वही उर्जा,वही उत्साह ….गत तीन दिनों दिल्ली प्रांत के युवा के कार्यक्रम में! सामने बैठे 500 से अधिक युवक-युवतियां! पर मजाल जो कोई रंगाहरि जी के उदबोधन में हिल भी जाए!
कोई उन्हें ज्ञान का सागर कह रहा था तो कोई उन्हें एनसाईक्लोपीडिया…
संघ की प्रार्थना से लेकर द्वितीय सरसंघचालक श्रीगुरूजी पर लिखी उनकी पुस्तकों तक अनेक के लेखक हैं!
दमदार लेखक,प्रखर वक्ता,सतत प्रवासी, ज्ञान का भंडार और सबसे बड़ी बात…निश्छल प्रेम का झरना..हर किसी को लगता है,रगांहरि जी का तो वही निकटतम है…एक प्रचारक..एक राष्ट्र ऋषि…
डा:हेडगेवारजी के प्रति हम गीत बोलते हैं..
हे युगद्रष्टा! हे महायति…पदवन्दन!
हे केशव,तुमको कोटि कोटि अभिनंदन!
उन्हीं को ही समर्पित ये पक्तिंया भी…