भोपाल के विभाग सहसंयोजक बाबूदास जी के बेटे को जो पढाई के साथ साथ कमाई भी कर रहा है,उसे मैने स्वरोजगार हेतू कुछ टिप्स दिए व प्रोत्साहन दिया!
इंदौर व जबलपुर के कार्यकर्ताओं के साथ बैठकों में!
कल रात मैं भोपाल से जबलपुर ट्रेन से जा रहा था! अचानक बारह बजे मेरी नींद खुली! क्योंकि दो पुलिस वाले एक युवक को जो मेरे सामने वाली सीट पर सो रहा था,ले जाने की ज़िद कर रहे थे!
पहले तो मैं समझा कुछ गड़बड़ किया होगा तो मुझे क्या? किन्तु उस युवक की आवाज़ में भराहट सुनकर मुझे लगा कि इसमें पड़ना चाहिए!
मैंने पूछा माज़रा क्या है? तो पुलिसवाले इसके और इसके साथी पर केस बनाने में लगे थे!कि इन्होंने लड़कियों को तंग किया है!
मेरी ही ऊपर की सीट पे बैठी 2 लड़कियोँ ने वास्तव में शायद फ़ोन से पुलिस को बुलाया था कि ये लड़के हमारे को तंग कर रहे हैं! मैंने मामले को समझा! वह लड़का कह रहा था “अरे,दीदी मैंने एक भी शब्द आपको कुछ कहा नहीं, फिर आपने मेरी शिकायत क्यों की है?
किन्तु लड़कियाँ भी कह रही थी “नहीं हम तो तुम्हारे गाने(मोबाईल) की आवाज से डरी हुई है!”
पुलिस वालों को देख, मैंने लड़कों को पूछा “तुमने कोई शब्द बोला तो नहीं?”तो वह कसमें खाने लगे! तब मैंने पुलिसवालों से मुख़ातिब होकर कहा “कि अरे ऐसे ऐसे कैसे बना सकते हो तुम?” और लड़कियों से पूछा “तुम्हारे को कोई शब्द कहा क्या?
इस पर लड़कियाँ भी चुप हो गई! तब मैंने साथ की सीट पर सो रही महिला को भी जगा लिया! उसने भी कहा कि “हाँ लड़के का क़सूर नहीं दिखता!” अब पुलिस वाले ने देखा कि मैं और वो महिला दोनों ही एकमत थे!
फिर हम दोनों ने लड़कियों से भी बात की! उन्होने भी माना कि वे केवल मोबाईल पर गाने से डरी थी!
फिर मैने दोनों लड़कों को कहा “ठीक है!इनको एक बार दोबारा दीदी बोलो!” उन्होने बोल दिया और आगे से कभी रात देर मोबाईल न देखने का भी प्रण किया!
पुलिस वाले ने फिर हमारे कहने पर उन लड़कों को छोड़ दिया! लड़के हमारे पैर छूकर अगले कूपे में जाकर सो गए!
सवेरे मैंने लड़कियों को शाबासी भी दी पर कहा “कि अगर तुम ज़िद मारतीं तो इन दो लड़कों की ज़िंदगी ख़राब हो सकती थी!यह ठीक है कि पुलिस सेवा और फ़ोन का सहयोग लेना चाहिए लेकिन यह भी ध्यान रखना चाहिए कि किसी लड़के कि बिना बात के ज़िंदगी ख़राब न हो!” तब उसने भी अपनी चूक मानी व आखों में पानी भर बोली “थैंक्यू अँकल!आपने बहुत अच्छी शिक्षा दी है!”
किंतु बाद में मैं सोचने लगा कि हमने ये बड़े होने के नाते से पारिवारिक सोच व तरीक़े से यह निपटा दिया,और दोनों पक्ष ख़ुश थे! पर क्या हम अपने यहाँ पर भी ऐसा करते हैं?आजकल छोटी छोटी बात पर ही थाना कचहरी में लोग पहुँच जाते हैं! क़ानून का सहारा लेते हैं उससे दोनों ही पक्ष अपना पैसा व समय बर्बाद करते हैं! पारिवारिक भाव से हम बहुत से मामले सहज निपटा सकते हैं!भारत की परंपरा यही तो है!