कल गुरूग्राम में हरियाणा के दो विभागों की स्व:जा:मंच की बहुत अच्छी बैठक हुई! पूरी टीम ने रोजगार सृजन हेतू योजनाओं की रूपरेखा विचारी
धर्मपाल को सियालकोट(पाकिस्तान) में पिताजी की मसाले बेचने की छोटी सी दुकान पर पाचंवी पास करके ही सहायता के लिए बैठना पड़ा!1947 मे देश का दुखद विभाजन हुआ तो सबकुछ छोड़ अमृतसर फिर दिल्ली आ गएशरणार्थी कैम्प में! काम क्या करें! तो धर्मपाल ने पिताजी से मिले पैसों मे से 650रूपये में ताँगा ख़रीद लियाऔर कनाटप्लेस से करोलबाग तक ताँगा ही चलाते रहे! आय बहुत नहीं थी तो इच्छाशक्ति व मेहनत के प्रतीक धर्मपाल ने अजमलखां पार्क में अपना पुराना काम(मसाले बनाने व बेचने) का शुरू कर दिया…उसी नाम से ‘महाशय दी हट्टी’!
समय व तकनीक के साथ तालमेल बैठाते हुए महाशय जी ने कंपनी बनाई ब्रांडिंग की और दुनिया के सामने है भारत का प्रसिद्ध ‘MDH’ मसाला उद्योग,! आज अमेरिका जापान सहित दुनिया के कोई 50 देशों में उनका एक्सपोर्ट्स हैं! 94की उम्र में भी तरोताज़ा हैं! उनका ट्रस्ट 250 बिस्तर का बड़ा हस्पताल व 4 बड़े स्कूल(दिल्ली,विद्या भारती हरिनगर का महाशय चूनीलाल सरस्वती स्कूल उनके पिताजी के नाम पर ही है) एकल विद्यालय मे सहयोग सहित कई सेवा के काम करता है! बड़ी पूँजी,बड़ी शिक्षा या सरकारी सहयोग नहीं बल्कि बड़ी इच्छाशक्ति,बड़ी सूझबूझ व बड़ी मेहनत सफलता की त्रिवेणी है!!
.जय स्वदेशी