परसों हुई रोजगार चिन्तन कार्यशाला के समापन पर जन-गण-मन…बोलते हुए,पैट्रोलियम मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान,संघ,स्वदेशी के अधिकारी व अन्य स्वजन!
एक बार प्रयागराज में गांधीजी मोतीलाल नेहरू के घर गए! जवाहर लाल नेहरू भोजन से पूर्व उनके हाथ धुलवाने लगे! गांधी जी किसी विषय पर बात कर रहे थे,इसके कारण जब पानी का लौटा खत्म हुआ व नेहरू दूसरा भरने लगे,तो गांधी जी चौंककर बोले “अरे!यह क्या किया? मेरे हाथ पर इतना पानी अधिक लगा दिया?”
इस पर नेहरूजी बोले “महात्मा जी! आप चिन्ता न करें! यहां पानी की कोई कमी नहीं!यहां गंगा व यमुना दो-दो नदियां बहती हैं!”
इस पर गांधी जी थोड़ा क्रोधित होते हुए बोले..”नेहरू! ये क्या सोच है,तुम्हारी! ये गंगा,यमुना क्या केवल मेरे लिए बह रही हैं! इस पर करोड़ो मनुष्यों ही नहीं बल्कि जीव-जन्तुओं,पक्षियों का भी अधिकार है, वे भी इसी के सहारे जी रहे हैं! यदि मैं आवश्यकता से अधिक लेता हूं तो किसी न किसी का हिस्सा लेता हूं! याने मैं किसी की चोरी करता हूं! जो कि सरासर गल्त है!”
*आज की देशभक्ति:तेल-वाहन का साप्ताहिक उपवास!!
बात 1965 की है! लाल बहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री थे! उन दिनों में हमारे देश में गेहूं हमारी जरूरत से कम होता था! हमें अमेरिका से आयात करना पड़ता था!अमेरिका की नीति उन दिनों पाकिस्तान की तरफ रहती थी! अत:उस समय के एक समझौते PL480 के तहत गेहूं देने के बदले कुछ अनुचित मांगे अमेरिका मनवाना चाहता था!शास्त्री जी ने साहसिक निर्णय लिया ! उन्होंने सारे देश से अपील की “सभी देशवासी सोमवार के दिन भोजन न कर उपवास रखें!60 करोड़ लोगों के एक वक्त से बचे हुए अनाज से करोड़ो लोगों का काम चल जाएगा! व हमें विदेशों के आगे हाथ नहीं पसारने पड़ंगें!
उस अपील का व्यापक असर हुआ! करोड़ो लोगों ने माना!कुछ लोग तो अब तक भी सोमवार को इसीलिए व्रत रखते हैं! आगे चलकर तो देश खाद्यान्न में आत्म निर्भर ही हो गया!
मैं सोच रहा था कि आजकल पैट्रोल-डीजल के मामले में जब तेल उत्पादक देश मनमानी कर रोज दाम बढा रहे हैं,दुनिया भर की मजबूरी का फायदा उठा रहे हैं! तो क्या हम शास्त्री जी के उदाहरण को दोहरा नहीं सकते!कि सप्ताह में कम से कम एक दिन तेल से चलने वाले वाहनों का उपयोग नहीं करेंगें! याने तेल-वाहन उपवास!
हमारे आयात का 27% पैसा केवल कच्चे तेल के कारण बाहर जा रहा है! प्रतिवर्ष कोई 5.5 लाख करोड़ रूपये!
आओ! करें नया उपवास! आज की देशभक्ति का एक रूप!…क्या कहना है, आपका?