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उसी ऑटो वाले श्री चंद के साथ एक सेल्फी
कल मैं दिल्ली में स्वदेशी के आर के पुरम कार्यालय से दीनदयाल मार्ग वाले कार्यालय हेतु निकला। ऑटो वाले से,स्वभाविक रूप से बातचीत शुरू हुई “क्या नाम है, बच्चे कितने हैं,सब ठीक है? वह बोला मेरा नाम “श्रीचंद है। पिछले 24 साल से ऑटो चला रहा हूं। अपना मकान बना लिया है। करोना के कारण कमाई कम है,अन्यथा हजार रुपे तक प्रतिदिन कमा लेता था।”
मैंने पूछा “बच्चों के संस्कार ठीक हैं।”
तो वह बोला “बड़ी बेटी की शादी की है।उसमें ₹6लाख लग गया। मेरे पास तो पैसे कम थे, पर बेटे ने व उसकी मां ने सारा जुगाड़ करके,कर दिया और उधार भी नहीं है।”
मैंने पूछा “क्या करता है बेटा, कितना कमाता है?”
कहने लगा “वैसे तो सिंपल बीए है पर एक कंपनी में कंप्यूटर का काम करता है,कमाई मुझे पता नहीं। हर महीने मां को ही देता है,मैं भी पूछता नहीं,पर अच्छा ही कमाता है।”
मैंने पूछा बाकी सब कैसा है?”
वह बोला “दूसरे नंबर पर लड़का है।तीसरे पर लड़की चौथे पर फिर छोटा लड़का है। जो बारहवीं में पढ़ता है। अब बहन कहती है की भाई की शादी करो,इसका समय है।मेरी उम्र तो अभी 21 भी पूरी नहीं हुई। पर भाई कहता है कि नहीं! पहले इसकी करनी है ताकि ठीक घर में जा सके, मैं तो बाद में कभी भी कर लूंगा।”
मै सोच में पड़ गया कि हमारे यहां आम भारतीय परिवार कैसे सुगठित है।आपस में एक दूसरे को सुखी रखने की सोच है,होड़ है।
बहन कह रही है कि उम्र हो गई है इसलिए भाई की शादी करो और भाई कह रहा है कि पहले बहन ठीक घर में चली जाए,फिर देखेंगे,कैसा प्यार, त्याग का भाव?
घर का सारा हिसाब मां रखती, करती है। कमाई बाप बेटा करते हैं जबकि तथाकथित पढ़े-लिखे और संभ्रांत परिवारों में इतना आपसी लगाव प्रेम भाव बहुत बार नहीं दिखता।
वह आगे बोला “चारों बच्चों को उनकी मां रोज मंदिर लेकर जाती रही है। कोई व्यसन किसी बच्चे में नहीं है। मैं तो सारा दिन ऑटो में लगा रह जाता हूं पर बच्चों की मां के कारण सब ठीक चलता है।इसी परिवार की मजबूत परंपरा ने भारतीय समाज को सुखी संपन्न रखा है।
~सतीश कुमार