मंत्रालयम मंदिर होकर जब हम वापिस आए,चैन्नै बैठक लेते कश्मीरी लाल जी,मदुरै में होने वाले स्वदेशी सम्मेलन की चर्चा,व परिवार के साथ भोजन करते हुए हिन्दुत्व की चर्चा!
मन्त्रालयम बैठक के बाद हम चैन्नई पहुंचे! दक्षिण क्षेत्र की स्वदेशी टोली बैठक वहां थी! कैसे इन प्रांतों में अपना कार्य बढे़? मदुरै में होने वाले स्वदेशी सम्मेलन की तैयारी कैसे अच्छी हो? इस पर खुली चर्चा हुई,कश्मीरी लाल जी का मार्गदर्शन रहा!
कल मदुरै में सुंदरम जी के घर चर्चा चली कि दक्षिण के मंदिरों में सिर्फ धोती में क्यों जाते हैं?वहां चप्पल घर के बाहर क्यों उतारते हैं?
सुंदरम जी की पत्नी ने उतर दिया “ मदिंर भगवान का घर है! वहां सबको एक जैसा दिखना चाहिए!राजा हो या रंक,और साधारण वेष में जाना चाहिए,कोई दिखावा नहीं करना,इसलिए ऐसे जाने की परंपरा है!”
“घर में चप्पल न ले जाने के दो कारण हैं! पहला कि चप्पल जूते में गंदगी हो ही जाती है,घर में स्वच्छता(hygiene )रहनी ही चाहिए! लेकिन दूसरा बड़ा कारण है हम घर को मंदिर ही मानते हैं,और मंदिर में तो जूते कोई भी नहीं ले जाता,अत: हमारे ले जाने का प्रश्न ही नहीं!”
फिर वहां महिला कार्य प्रमुख उमा मुरूगन के घर चर्चा चली कि वहां सर्वाधिक पूज्य देवता कौन है?
तो उमाजी के पति बोले “शिव व शिव परिवार” वे आगे बोले “यहां बहुत उच्चशिक्षित व कारपोरेट आफिस में जाने वाले को भी माथे पर लम्बा तिलक लगा कर आफिस जाने में हर्ज नहीं,मैं स्वयं हमेशा तिलक लगा कर ही जाता हूं!”
बाद में दक्षिण में ईसाई व मुस्लिम गतिविधियां भी बहुत तेज हैं,सरेआम गौमांस बिकता है!इसको कैसे बदला जाए,यह चर्चा चली!
स्वदेशी,संघ व भाजपा की क्या स्थिती है? संभावनाएं क्या है?
लेकिन सबका निश्कर्ष था “कभी स्वामी विवेकानंद ने इसे(केरल) जरूर पागलों की धरती कहा था! लेकिन यहां हिन्दुत्व की जड़े इतनी गहरी हैं व अब तो परिवार संगठनों का कार्य भी दक्षिण में इतना अधिक फैल गया है कि,राष्ट्रीयता का,स्वदेशी का,हिन्दुत्व का सूर्योदय कोई रोक नहीं सकता!
जब पुर्वोतर में हिन्दुत्व के उभार की चिट्ठी लिखी थी तो कुछ कार्यकर्ताओं ने पूछा था “क्या कभी दक्षिण का भी ऐसा समाचार आएगा?”
तो उसका उतर यहीं मिला “अवश्य!और बहुत जल्दी..अंधेरा छटेगा,सूरज निकलेगा और….”