सिक्किम में अर्थ एवं रोजगार सृजक सम्मान कार्यक्रम में संयोजक गिरीश खांडे सम्मान करते हुए
परसों मैं दिल्ली कार्यालय से शिमला चंडीगढ़ के प्रवास के लिए निकला।
आदत अनुसार ऑटो वाले से बातचीत शुरू की। कमाई आदि पूछने के बाद मैंने पूछा “बच्चे कितने हैं?”
तो वह बोला “चार!”
मैं सुनकर थोड़ा हैरान हुआ। मैंने कहा “आजकल तो 4 बच्चे होते नहीं, तुम्हारे क्यों हैं?”
वह बोला “साहब मैं मेरठ का रहने वाला हूं। वहाँ मुसलमानों के भी तो चार-पांच होते हैं मेरे हो गए तो क्या हुआ?”
मैंने कहा “तुम्हारे 4 बच्चों में लड़के लड़कियां कौन हैं?”
तो उसने बताया “बड़ी तीन लड़कियां हैं, सबसे छोटा लड़का है।”
मैंने कहा “सच-सच बताओ! मुसलमानों के बराबर हमारी जनसंख्या होनी चाहिए इसलिए किए हैं चार बच्चे या लड़के के चक्कर में हो गए?”
मेरे हाव भाव देखकर वह मुस्कुराया और बोला “हां,सर! असली बात यही है, लड़के के चक्कर में ही 4 बच्चे हो गए।”
तो मैंने उसे समझाया “देख भाई! अब पुराना जमाना नहीं रहा। लड़कियां लड़कों में फर्क नहीं रहा। हमारे घर में देखो हम तीन भाई भाभी मिलकर जितनी माँ की सेवा करते हैं उससे कहीं अधिक मेरी दोनों बहने सेवा करती हैं।”
वह बोला “हां! है तो बात सही!” मैंने उसे मजाक में कहा “अब तेरा कुछ नहीं हो सकता पर अब आगे मत बढ़ना।”
**किंतु जब मैं ट्रेन में बैठा तो उसके पहले वाक्य पर सोचने लगा “भारत में आजादी के बाद मुस्लिम जनसंख्या का अनुपात 8% से बढ़कर 14% हो गया है और हिंदू का 90 से घटकर 84% रह गया है।
मजहब के आधार पर देश तुड़वाने के बाद भी हमने कुछ नहीं सीखा। 1947 के बाद बटे कटे हुए भारत में भी अपनी जनसंख्या को हम घटते देख रहे हैं, और कुछ विशेष नहीं कर रहे। 2021 की जनगणना होनी है, कुछ दिन शोर मचाने के अलावा हिन्दू समाज कुछ नहीं करता।”
“पर अब जगना ही होगा। इसके लिए व्यापक जन जागरण चाहिए और सरकार को संतुलित जनसंख्या कानून याने सभी के लिए दो बच्चे का कानून बनाना ही चाहिए। अधिक होने पर सरकारी नौकरी, राशन आदि की सुविधा नहीं मिलेगी ऐसा प्रावधान सोच सकते हैं।”
आप भी अपने विचार दे सकते हैं।