आसाम में आज एक ऐसी घटना घटी जो भारत में मां और बच्चे का कैसा संबंध होता है,उस को दर्शाती है!
हुआ यूं कि गुवाहाटी के पास ब्रम्हपुत्र नदी है,वहां पर एक परिवार किश्ती से नदी पार कर रहा था कि वह बीच में एक लगे हुए पिलर से टकराकर उलट गई! सभी 6-7 यात्री डुबकियां लगाने लगे! माँ ने चिल्लाकर अपने बेटे 11 वर्षीय कमलकिशोर को कहा “तैरकर किनारे पहुंच” और वह जल्दी से तैरकर किनारे पहुंचा!किंतु पहुंचते ही उसके ध्यान में आया कि वह तो बचा,लेकिन मां कहां बची है?
उसको तो तैरना भी नहीं आता! अत: उसने फिर से नदी में छलांग मार दी और डूबती,उतरती अपनी मां को पहले बाल से पकड़ा,फिर हाथ से पकड़ा और किसी तरीके से किनारे पर ले आया!इतनी देर में उसे चिल्लाती हुई चाची दिखी,तुरंत उसने फिर से छलांग लगाई व उसे भी पकड़कर किनारे ले आया!
यही नहीं उसने एक और महिला को भी बचाने का प्रयास किया जिसमें सफल नहीं हो पाया!11 वर्षीय कमल किशोर ने 3 बार अपने को दांव पर लगाकर अपनी मां जयोति मणि दास व चाची को बचा लिया!
माँ की आज्ञा के सामने,गवर्नर की
आज्ञा का कोई मतलब नहीं…
यह बात 1914-15 की होगी!स्श्यामा प्रसाद मुखर्जी के पिता सर आशुतोष मुखर्जी उस समय पर बंगाल विश्वविद्यालय के उपकुलपति थे!उनके जैसा बुद्धिमान व पढालिखा दूसरा उस समय पर कोई नहीं था! उस समय के भारत के गवर्नर जनरल कर्जन से उनकी बहुत अच्छी दोस्ती भी थी!वह कोलकाता हाईकोर्ट के जस्टिस भी उसी समय पर थे!
एक विशेष बैठक के लिए गवर्नर जनरल कर्जन को लंदन जाना था तो उन्होंने आशुतोष को बुलाया और कहा “20 दिन बाद हम लंदन चलेंगे!मैंने 5 लोगों का चुनाव किया है,बाकी सब तो अंग्रेज हैं,केवल आप ही भारतीय हैं!आप इस इस विषय की तैयारी कर लें!”
आशुतोष मुखर्जी ने कहा “वह तो ठीक है,किंतु मुझे अपनी मां से अनुमति लेनी होगी!” यह सुनकर गवर्नर जनरल आश्चर्य में पड़ गए किंतु कहा “हां-हां,ले आओ!”
अगले दिन आशुतोष ने आकर बताया “मां ने अनुमति नहीं दी,क्योंकि मां का मानना है कि समुद्र पार करने में दोष लगता है!”
तो गवर्नर जनरल ने कहा “जाकर अपनी मां से कहो! कि मैं भारत का गवर्नर जनरल तुम्हें आदेश दे रहा हूं कि तुम्हें मेरे साथ लंदन जाना ही होगा”
यह सुनकर आशुतोष मुखर्जी ने कहा अगर यह बात मैंने घर पर कहीं तो मेरी मां का उत्तर भी सुन लें!वह कहेगी “आशुतोष की मां का आदेश है कि तुमको लंदन नहीं जाना है!”
तो गवर्नर जनरल ने पूछा “तो तुम किसकी मानोगे?” आशुतोष ने निसंकोच उत्तर दिया “बिल्कुल,अपनी मां का आदेश ही मुझे मानना पड़ेगा!”और वही हुआ भी अगले दिन आकर आशुतोष ने बता दिया कि मां नहीं मानी और मुझे मां का आदेश मानते हुए लंदन जाना संभव नहीं!बाद में कर्जन ने लिखा “कि यदि भारत के सबसे बुद्धिमान व्यक्ति का यह हाल है,तो हम सोच सकते हैं कि भारत में परिवार संस्कृति कितनी सशक्त है!और भारतीय लोगों के सोचने का ढंग कैसा रहता है?”
ऐ माँ तेरी सूरत से अलग,
भगवान की सूरत क्या होगी…