इन गर्मी की छुट्टियों में जीरकपुर (पंजाब) की बहिन एकता नागपाल ने एक नया,अद्भुत व उत्तम प्रयास किया बच्चों के विकास का…मुझे लगा की आप सबको भी बताऊँ..
उन्होंने अपने आस पड़ोस के 25-26 बच्चों को इन छुट्टियों में 7 दिन के Moving Camp लिए तयार कर लिया…
लेकिन क्या किया उसमें..?
वह उन्हें खेतों,खलिहानों में ले गयी.खेत दिखाए, पेड़ पर चङो, पत्थर मार कर जामुन उठाओ, खाओ..ट्यूबवेल पर स्नान..रोटी पर माखन लगा कर खाओ, गन्ना चूसो..आदि!
फिर एक दिन गौशाला में सेवा, गुरुकुल भ्रमण, परिवार मिलान..सहभोज
एक दिन रात को खुले में तारे गिनो..चंदा मामा की कहानी..
नानी दादी की कुछ कहानियां, देसी नुस्खे..
फौजी के संघर्ष पूर्ण जीवन की झलक, स्वतंत्रता सेनानी की जिंदगी जीने का अनुभव,उन्हें भगतसिंह कीे वेशभूषा पहन कर..
मैने पूछा एकता जी से- “कैसे आया ये विचार?”
वे बोली “सतीश जी,अपना तो संघ परिवार है ही। यही तो हर बैठक में, शाखा में चरचा होती है,की नई पीड़ी में अछे व् देशभक्ति के संस्कार कैसे आएं?”
“इसी बात से प्रेरित होकर ये 7 दिन का ‘जड़ों से जुड़ो’ कार्यक्रम बनाया! जो बेहद सफल रहा!”
सारा देख सुनकर लगा की ऐसे प्रयास सब तरफ होने चाहिये, अन्यथा मोबाइल, टीवी, फेसबुक में ही समय ख़त्म हो रहा है बच्चों का!
रवीन्द्रनाथ टैगोर:-“प्रत्येक पैदा होता बच्चा, परमात्मा का यह सन्देश लेकर आता है,की मानवता से उसका विश्वास अभी उठा नहीं है!”
-–———————-
थोड़ा मुस्कुराएं…?😊
संता,पत्नी के साथ मंदिर के पीछे वाले कुँए के पास गया! हाथ जोड़कर आँखे बंद की और कुँए में एक 5₹ का सिक्का,थोडा झुककर डाल दिया!
पत्नी ने पूछा..”ये क्या है?”
संता “यहाँ जो भी मन्नत मांग कर सिक्का डालो तो पूरी होती है!
पत्नी ने भी वही किया! पर कुँए में सिक्का डालने को झुक्की तो फिसल कर कुँए में ही गिर गयी!
इधर संता की आँखों में आंसू! बोला “मुझे विश्वास तो था मनोकामना पूरी होगी!पर इतनी जल्दी …आप बहुत दयालु हो प्रभु!”