4 दिन पहले मैं करनाल में डीएवी कार्यक्रम में बोल रहा था।तभी एक लड़की ने प्रश्न किया “सर!आप कह रहे हैं कि रोजगार सरकार नहीं दे सकती तो फिर मुझे रोजगार देना किसकी जिम्मेदारी है?
मैंने कहा “तुम्हारी स्वयं की।”
वह बोली “मैं कैसे कर सकती हूं? मेरे पास तो ₹10000 भी नहीं है। और नौकरी तो आप भी मना ही करते हैं।”
तब उसे मैंने उद्यमिता का संदेश दिया।
किंतु संयोग ऐसा बैठा की अगले दिन जब मैं जयपुर पहुंचा तो अपने स्वदेशी के कार्यकर्ता सुदेश सैनी जी मुझे अपना एक प्रसंग बताने लगे
“मैं चूरु में अपने गांव में गया था।वहां मां ने कहा अरे अपने दुकान पर जो 40 साल से काम करता रामकिशन है उसके लड़के को कहीं काम करवा दे,शादी हो गई है किंतु अभी बेरोजगार है।” मैंने कहा “कोई नहीं देखता हूं।”
“4 दिन बाद मैंने उसको बुलवाया।वह हलवाई का काम करने मैं माहिर था।तो मैंने बात करके उसे एक दुकान किराए पर ले दी। किराया केवल ₹2000 महीना।अपना सिलेंडर और कुछ 4-5 कुर्सी मेज व ₹10000नकद दे दिए। वहां पर ट्यूशन पढ़ने वाले बच्चे काफी आते हैं यह कचौरी स्वादिष्ट बनाता है।”
“पहले ही दिन से इसकी अच्छी सेल शुरू हो गई और अभी केवल 2 महीने हुए हैं इसने मेरे ₹10000 वापस कर दिए हैं और 14-15 हजार रुपए तक की नेट कमाई करने लग गया है। एक लड़का भी काम पर इसने रख लिया है।और यह जल्दी ही 25-30 हजार कमाने लगेगा। 3-4 और को भी रोजगार देगा।”
मैं सोच में था कि अगर मैंने उस लड़की का फोन नंबर लिया होता तो उसे कहता कि ऐसे रोजगार सृजन होता है, हमारे यहां~सतीश
नीचे जयपुर प्रांत विचार वर्ग का समापन प्रांत संघचालक महेंद्र सिंह जी मग्गो के साथ व कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में हुआ कार्यक्रम