(Image Courtesy: Indiafacts.org)

चाइनीज़ कोरोना महामारी संकट भारतीय समाज व आर्थिक स्थिति के लिये एक दूरगामी प्रभाव सिद्ध होगा। इसके कारण देश मे एक स्वदेशी जागरूकता अभियान चल पड़ा है जो प्राचीन भारतीय व्यापार माॅडल के और इशारा कर रही है। वैसे तो देश मे ऐसे बदलाव पांच साल से दिखाई दे रहें है। जब से राष्ट्रवादी सरकार केन्द्र मे आई है, ऐसा लग रहा है कि देश एक आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था बनने के दिशा मे जोरदार प्रयास कर रहा हैं।

इसमें केन्द्र सरकार की 2025 तक पांच ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर अर्थव्यवस्था की लक्ष्य को आधार मानकर देखना चाहिए। इस अभियान को आप मोदी जी का मंत्र ‘लोकल के लिए बनें वोकल’ से जोड़ सकते है। आने वाले दिनों में यह ट्रेंड करेगा। उन्होंने कहा कि कोरोना महामारी संकट के दौरान हमें लोकल ने बचाया है। यह देश की ताकत है, जिसे हमें पहचानना होगा। साथ मे लोकल प्रोडक्ट और सप्लाई चेन कितना जरूरी है।

चाइनीज़ संकट ने पूरे विश्व को ऐसे एक मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है  कि इस चक्रव्यूह से बाहर आने मे कुछ बर्ष लग जायेंगे। इस समय देश के सामने बहुत सारे चुनौतियां है। सबसे बड़ी चुनौती है- शत्रु चीन को देश की अर्थव्यवस्था से बाहर करना। लेकिन वास्तव मे यह इतना आसान नहीं है। इस महाविनाश मे विकासशील देशों के साथ विकसित देश भी बुरी तरह से प्रभावित हुए है। इस समय विश्व के सभी देशों ने इस कोरोना महामारी के कारण मन बना लिया है कि आने वाले दिनों मे चीन का आर्थिक बहिष्कार कैसे किया जाए।

कुछ विकसित देश जैसे जापान, जर्मनी, ऑस्ट्रेलिया व अमेरिका ने इस दिशा मे कार्य करना शुरू कर दिया है। यदि हम अपने देश की स्थिति देखें तो यह नजर आता है कि इसमे अर्थतंत्र से ज्यादा जरूरी प्रबल इच्छाशक्ति होनी चाहिए। कुछ साल पहले अमेरिका व यूरोप की कुछ देशों मे एक अनुसंधान संस्थान का एक रिपोर्ट में कहा गया था कि किसी भी व्यक्ति की रोज के व्यवहार मे आने वाले ज्यादातर सामान चीन में ही निर्मित है। यह स्थिति भारत मे भी है। अपने देश मे करीब 60 प्रतिशत मोबाइल चाइनीज़ है। इसके अलावा इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, मशीनरी पार्ट्स, रसायन, औषधि बनने वाली API, कपड़े, खिलोने इलेक्ट्रॉनिक सामान, होली, दीपावली व अन्य उत्सव के समय बाजार मे भरपूर चाइनीज़ सामान से पता चलता है कि हम आप के जीवन मे चीन मे निर्मित सामान का उपर निर्भरशीलता।

इन दिनों मे जब से कोरोनावायरस के चलते लाॅक डाउन शुरू हुआ और हम सभी घर से काम कर रहे है। सारी मीटिंग कॉन्फ्रेंस Zoom एप पर हो रही है। यह एप भी चाइनीज है। यहां तक स्कूल के बच्चें भी इस एप पर पढाई कर रहें है। इसका मतलब यह है कि हमारा सबसे बड़ा शत्रु आज हमारे घर मे परिवार तक पहुंच गया है। इसके अलावा अनेक भारतीय चीन मे व्यापार भी करते है। देश के अनेक उद्योगपतियों ने अपने प्रोडक्शन हाउस चीन मे स्थापित किया है।

इन सभी चाइनीज़ चीजों से यदि हम छुटकारा पाना चाहते है तो वैकल्पिक व्यवस्था व आपूर्ति कैसे हो सकता है, इस दिशा मे हमें सोचने की आवश्यकता है। जहां तक चीन के साथ द्विपक्षीय व्यापार की बात है, इस समय Balance of Trade चीन के पक्ष है। जनवरी व फरवरी 2020 मे चीन से हमने 9.5 बिलियन डॉलर का सामान आयात किया और हमने केवल 2.5 बिलियन डॉलर का सामान निर्यात किया। इससे पता चलता है कि हम चाइनीज़ सामान के उपर कितने मात्रा मे निर्भरशील है। ऐसे स्थिति मे वैकल्पिक समाधान खोजने पड़ेंगे।

चीन मुख्य रूप से भारत को इलेक्ट्रॉनिक, इलेक्ट्रिकल, स्टील, मशीनरी, फर्टिलाइजर, रसायन व औषधि इत्यादि निर्यात करता है। जहां तक चीन के उपर निर्भरता की प्रश्न है यह इतिहास बहुत पुराना नहीं है। सन 1992 से दो एशियाई देशों के बीच पूर्ण विकसित व्यापार संबंध स्थापित हुआ है व पिछले एक दशक मे दोनों देशों के बीच व्यापार मे चार गुना वृद्धि हुई है। इसका कारण है चीन मे उत्पादन की लागत इतनी कम है।

भारत के मुकाबले चीन में श्रम कानून अत्यंत सरल है। उद्योग मे लगने वाले सरकारी नियंत्रण व कानून भी भारत के मुकाबले मे चीन काफी आगे है। कुछ ऐसे सामान है जैसे कि दवा बनाने के लिए  Active Pharmaceutical Ingredients (API) की 85 प्रतिशत चीन से आयात किया जाता है। धीरे धीरे पिछले दो दशकों मे भारत की औद्योगिक उत्पादन मे लगातार कमी आ रही है। फलस्वरूप व्यापार का संतुलन (Balance of Trade) चीन के पक्ष मे हो रहा है। यदि हम चाइनीज़ सामान को पूर्ण रूप से त्यागना चाहते है तो इन सभी बिन्दुओं का व्यवहारिक समाधान निकालना पड़ेगा।

आर्थिक उदारीकरण की प्रक्रिया में अंतरराष्ट्रीय व्यापार एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, लेकिन समस्या उत्पन्न तब होती है जब इसके पीछे कोई देश साम्राज्यवादी नीति अपनाकर किसी देश के राष्ट्रीय व्यापार को खत्म करने की कोशिश करता है। इस समय भारत सहित सम्पूर्ण विश्व मे चीन यह नीति अपना रहा है जो चिंताजनक विषय है। इस दिशा में केन्द्रीय सरकार ने कोरोना संकट काल में कुछ महत्वपूर्ण निर्णय लिया है।

यह अत्यंत सराहनीय कदम है एवं मोदी जी बधाई के पात्र हैं। इसमे चीन द्वारा सुनियोजित ढंग से राष्ट्र को बर्बाद करने वाली Regional Comprehensive Economic Partnership (RCEP) से बाहर आना, चीन द्वारा भारतीय कंपनियों मे निवेश से पहले संबंधीत मंत्रालय से पूर्व अनुमति लेना व लोकल को बढ़ावा देने के बात, आने वाले दिनों मे भारतीय बाजार की व्यापार मे एक सकारात्मक वातावरण निश्चित रूप से देखने को मिलेगा। इस दिशा मे Make In India जैसे योजना से भी आने वाले दिनों में बहुराष्ट्रीय कंपनी जो चीन से बाहर आने चाहते है, उनको भी आकर्षित करेगा।

सबसे जरूरी है भारतीय लोगों को चाइनीज़ सामान त्याग करने के लिए प्रतिज्ञा करनी पड़ेगी, चाहे सोशल मीडिया की एप हो या अन्य सामान, इलेक्ट्रॉनिक से लेकर कोई भी वस्तु। ऐसा नहीं कि वैकल्पिक व्यवस्था नहीं है। जैसे कि Zoom की बदले मे भारत मे निर्मित Namaste App का प्रयोग किया जा सकता है। इसीलिए इच्छाशक्ति ज्यादा जरूरी है।

चीन को आज सफलता हासिल करने मे उनके जनता द्वारा पूर्ण रूप से विदेशी सामान बहिष्कार की नीति अपनाने के कारण संभव हुआ है। इस लाइन मे हमे सोचने की जरूरत है। यदि हमें इस दिशा मे सफलता मिल जाती है तो हमारा देश भी आत्मनिर्भर बन सकता है, साथ मे विकसित देश बनने की दिशा में एक कदम आगे बढ़ने का मार्ग प्रशस्त हो जायेगा। 

वन्देमातरम!

 

~ Jibanand Bhattacharjee

(The writer is retired from a Nationalised Bank as Assistant General Manager and currently engaged in Project Finance Consultancy and Practicing Cost Accountant.)