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सिर मुंडाते ही ओले पड़े, यह भारतीय कहावत चीन पर एकदम सटीक बैठ रही है और यह सिर्फ इस सन्दर्भ में नहीं है कि आखिरकार चीनी सेनाओं को पीछे हटना पड़ा है। यहां मैं बिल्कुल दूसरे सन्दर्भ की बात कर रहा हूं या यूं कह लें कि वह सन्दर्भ भी भारत और चीन के बीच के सीमा विवाद की एक वजह है। और, वजह है चीन की अतिमहत्वाकांक्षी वन बेल्ट वन रोड (OBOR) या बेल्ट एंड रोड इनीशिएटिव (BAR)परियोजना।

उसी बेल्ट एंड रोड इनीशिएटिव की पायलट परियोजना के तौर पर चीन ने पाकिस्तान को आधुनिक विश्व की यातायात, तकनीक, संचार, ऊर्जा और दूसरी जरूरतों को पूरा करने वाली योजना बताकर CPEC यानी चाइना पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरीडोर यानी चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारा- के तौर पर विकसित करना शुरू किया।

2013 में 70 देशों से गुजरने वाली अतिमहत्वाकांक्षी परियोजना की शुरुआत चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने की थी और चीन को उम्मीद थी कि पाकिस्तान निर्बाध तरीके से सबसे आसानी से इस परियोजना को पूरा कर लिया जाएगा और इससे पाकिस्तान की चीन पर पूरी तरह से निर्भरता हो जाएगी, साथ ही भारत के ऊपर भी दबाव बन जाएगा।

चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग को यह भी भरोसा था कि भारत को इसमें भी येन केन प्रकारेण शामिल करा ही लेंगे और उस भरोसे के पीछे एक बड़ी वजह 2008 में कांग्रेस पार्टी और चाइनीज कम्युनिस्ट पार्टी के बीच हुए समझौते से पैदा हुआ भरोसा भी रहा होगा, लेकिन 2013 में बेल्ट एंड रोड इनीशिएटिव के एलान के अगले ही वर्ष 2014 मई में भारत में सत्ता पूरी तरह से बदल गई है और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी, भारत के प्रधानमंत्री बने।

चीन की तानाशाही सत्ता को भरोसा था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी इस विशाल परियोजना के लिए यह कहकर मना लिया जाएगा कि अगर भारत इसमें शामिल नहीं हुआ तो दुनिया में और खासकर एशिया में इस विकास की बड़ी परियोजना से भारत बाहर हो जाएगा और इसका नुकसान उसे कारोबारी तौर पर भी उठाना पड़ सकता है।  

नरेंद्र मोदी ने देश के प्रधानमंत्री के तौर पर सभी पड़ोसी देशों के साथ रिश्ते बेहतर करने की शुरुआत की, उसमें चीन से लेकर पाकिस्तान तक शामिल थे। अचानक नवाज शरीफ के घर विवाह समारोह में पहुंच जाना या फिर चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ बिना किसी एजेंडे के मिलना, लेकिन नरेंद्र मोदी की प्राथमिकता में पड़ोसी देशों से रिश्ते बेहतर करना इसीलिए था कि भारत को बेहतर किया जा सके।

आर्थिक और वैश्विक दृष्टिकोण से भारत की भूमिका बढ़ी, लेकिन पाकिस्तान ने अपनी नीति में कोई परिवर्तन नहीं किया, जिससे भारत ने पाकिस्तान के साथ अपने सारे रिश्ते खत्म कर लिए और कहाकि गोली और बोली एक साथ नहीं होगी। आतंकवादी हमले का जवाब बालाकोट में सर्जिकल स्ट्राइक से दिया गया। मोदी सरकार की पाकिस्तान नीति एकदम स्पष्ट दिख रही थी, लेकिन चीन के साथ मोदी सरकार संतुलन की नीति आगे बढ़ा रही थी। यह अलग बात थी कि असंतुलन भारत के ही हिस्से आ रहा था।

2001 में जिस चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा सिर्फ एक बिलियन डॉलर का था, 2013 आते-आते करीब 37 बिलियन डॉलर हो गया और नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद भी लगातार बढ़ते हुए 2019 तक करीब 60 बिलियन डॉलर पहुंच गया। इस बीच चीन के साथ बिना एजेंडे की बैठकों-मुलाकातों में नरेंद्र मोदी और भारत लगातार कारोबारी असंतुलन का मुद्दा उठाते रहे।

चीन लगातार आश्वासन देता रहा और भारत पर बेल्ट एंड रोड इनीशिएटिव के साथ RCEP- रीजनल कॉम्प्रिहेंसिव इकोनॉमिक पार्टनरशिप में शामिल होने के लिए दबाव बनाता रहा। बेल्ट एंड रोड इनीशिएटिव को भारत पहले ही अव्यवहारिक बताकर उससे अलग हो चुका था और नवंबर 2019 में बैंकॉक में RCEP की बैठक में खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मोर्चा संभाला और यह कहकर भारत को इससे अलग कर लिया कि इससे भारत के किसानों, छोटे-मंझोले उद्योगों और दुग्ध क्षेत्र का अहित होगा। मई महीने में चीन ने फिर से एक बार कोशिश की कि भारत इस समूह में शामिल हो जाए, लेकिन भारत ने शामिल होने से इनकार कर दिया। चीन के ऊपर यह तगड़ी चोट थी।

RCEP में शामिल देशों के रास्ते अपना सामान डंप करने की चीनी कोशिशों को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तगड़ी चोट दे दी थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ भले ही बिना एजेंडे वाली बैठकें करते रहे, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी के दिमाग में भारत का एजेंडा सबसे ऊपर था और उसे ही नरेंद्र मोदी बड़ी मजबूती से लागू करने में जुटे हुए हैं।

बेल्ट एंड रोड इनीशिएटिव को अव्यवहारिक बताकर अलग होने से भारत ने पहले ही चीन की अतिमहत्वाकांक्षी परियोजना की हवा निकाल दी थी। भारत के अलग होने के बाद विश्व के दूसरे देशों में चीन की इस परियोजना को लेकर संदेह बढ़ गया। भारत ने बेल्ट एंड रोड इनीशिएटिव की पायलट परियोजना चाइना पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरीडोर पर भी यह कहते हुए ऐतराज जताया कि यह परियोजना कश्मीर के उस हिस्से से गुजर रही है, जिसे पाकिस्तान ने कब्जा रखा है। यहां तक कि G20 समिट में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शी जिनपिंग के साथ हुई बैठक में इस मुद्दे को उठाया। भारत के लगातार विरोध और चीन के आक्रामक तरीके से इस परियोजना को आगे बढ़ाने की कोशिशों ने चीन की मुश्किल बढ़ा दी है।

अब पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर के स्थानीय लोग चीन के साथ पाकिस्तान का भी जमकर विरोध कर रहे हैं। चीन के शिनजियांग प्रांत से ग्वादर पोर्ट को जोड़ने वाले इस परियोजना से जुड़ी हर छोटी-बड़ी परियोजना देरी से चल रही है। 2013 में 46 बिलियन डॉलर की अनुमानित लागत से शुरू हुई चाइना पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरीडोर की लागत 2017 में ही 62 बिलियन डॉलर हो गई है। इसकी वजह यह भी है कि स्थानीय लोग इस परियोजना का जबरदस्त विरोध कर रहे हैं। चीन के दबाव में पाकिस्तान सरकार इस परियोजना का विरोध करने वाले हर स्थानीय नागरिक को आतंकवादी करार दे रही है।

मुजफ्फराबाद में CPEC से जुड़ी नीलम, झेलम और कोहाला हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट को स्थानीय निवासियों का विरोध झेलना पड़ रहा है। मुजफ्फराबाद में चीन और पाकिस्तान के खिलाफ प्रदर्शन हो रहे हैं। स्थानीय निवासी कह रहे हैं कि नीलम और झेलम नदियों पर अवैध बांध बनाना संयुक्त राष्ट्र संघ की शर्तों के खिलाफ है और चीन और पाकिस्तान कैसे हम कश्मीरियों की जमीन पर समझौता कर सकते हैं। बांध बनाने वाली कंपनी कोहाला हाइड्रोपावर कंपनी, चाइना थ्री गॉर्जेस कॉर्पोरेशन का हिस्सा है।

2.4 बिलियन डॉलर की परियोजना से बांध बनाकर 1124 मेगावाट का हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट शुरू किया जाना है। इस तरह की 40 से ज्यादा परियोजनाएं पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर और पाकिस्तान में सीपीईसी के अंतर्गत चीन शुरू कर चुका है। हालांकि, ज्यादातर परियोजनाओं में भ्रष्टाचार के बड़े मामले सामने आ रहे हैं। सेना और ISI के बड़े अधिकारियों के नाम भी इस भ्रष्टाचार में सामने आ रहे हैं। CPEC की ज्यादातर परियोजनाओं में देरी होती दिख रही है और ज्यादातर विशेषज्ञ CPEC को अव्यवहारिक बता रहे हैं।

अब भारत के साथ सीमा विवाद में खूनी संघर्ष होने के बाद CPEC और बेल्ट एंड रोड इनीशिएटिव पर ग्रहण लगता दिख रहा है। सबसे बड़ी बात है कि पाकिस्तानियों के मन में भी यह पक्के तौर पर बैठ गया है कि CPEC परियोजना पाकिस्तान की गुलामी की पक्की बुनियाद साबित होगी।

उस पर उइघर मुसलमानों के अत्याचार की खबरें भी उन्हें उद्वेलित कर रही हैं। अक्टूबर 2016 में पाकिस्तान के डॉन अखबार में छपी खबर के मुताबिक, पाकिस्तानी संसद की योजना और विकास पर बनी स्थाई संसदीय समिति के अध्यक्ष ताहिर मशादी ने CPEC को लेकर कहा था कि हमें चीन और पाकिस्तान की दोस्ती पर फक्र है, लेकिन राष्ट्रीय हितों को दरिकनार किया जाना ठीक नहीं है। CPEC दूसरी ईस्ट इंडिया कंपनी है। संयुक्त राष्ट्र संघ भी इस बात की चिंता जता चुका है कि बेल्ट एंड रोड इनीशिएटिव गरीब देशों पर कर्ज का बोझ बढ़ाएगा और CPEC से पाकिस्तान पर कर्ज का दबाव बहुत ज्यादा बढ़ जाएगा।

बलोच विद्रोही हर दूसरे दिन CPEC से जुड़ी परियोजनाओं को नुकसान पहुंचाते रहते हैं। चीन ने चाइना-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरीडोर को बेल्ट एंड रोड इनीशिएटिव का पायलट प्रोजेक्ट इसीलिए प्रचारित किया था कि पाकिस्तान सरकार पूरी तरह से उनके सामने घुटनों पर है और चीन अपनी शर्तों पर इस परियोजना को पूरा करके पाकिस्तान पर कब्जा जमाएगा, भारत को आंख दिखाएगा और दुनिया को इस परियोजना में शामिल होने के लिए प्रेरित करेगा, लेकिन अब मामला एकदम उलट हो गया है। सीमा विवाद में भारत से पिटे चीन के गले में CPEC अटक सा गया है और चीन को अब कोई रास्ता नहीं सूझ रहा है।

~हर्ष वर्धन त्रिपाठी

लेखक पत्रकार और हिंदी ब्लॉगर हैं।

Source Link: https://hindi.moneycontrol.com/news/foreign/chinas-cpec-is-blunder-and-how-china-trapped-in-it_236979.html