गांव में बकरी पालन करके हर महीने कमाता है 10 लाख रुपए...

आज हर किसी की ख्वाहिश होती है विदेश जाकर कोई अच्छी नौकरी करना और लाखों रूपए कमाना। पर शायद ही कोई ऐसा कोई व्यक्ति होगा जो अपने गाँव में रहकर किसी परंपरागत कारोबार को चुनने की हिम्मत रखता हो। आज देश में लाखों नौजवान बेरोज़गारी की मार झेल रहे हैं, हर कोई बस नौकरी की तलाश में शहर की ओर पलायन करता दिखाई देता है। लेकिन इसके पीछे की एक बड़ी वजह यह भी है कि आज लोग बेरोजगार रहना पसंद कर रहे हैं सिवाय खुद की मेहनत से कोई मुकाम बनाने की हिम्मत करने के। कोई नहीं चाहता की कुछ ऐसा किया जाये जिससे खुद के साथ-साथ दूसरों को भी रोज़गार प्रदान हो सकें।

लेकिन आज हम एक ऐसे व्यक्ति से आपको रुबरु करा रहे हैं जिन्होंने लोगों की सोच से परे जाकर अपनी विदेशी नौकरी छोड़, एक ऐसे करियर को चुना जिसे सुनकर आप भी चौक जायेंगे।

जी हाँ, बकरी पालन से कामयाबी की अनूठी कहानी लिखने वाले इस शख्स का नाम है डॉ अभिषेक भराड। डॉ भराड मूलरूप से महाराष्ट्र के चिखली तहसील के साखरखेर्दा गाँव के रहने वाले हैं। उनके पिता भागवत भराड सिंचाई विभाग में इंजीनियर के रूप में कार्यरत थे। चूँकि उनके पिता इंजीनियर थे, वे अपने बेटे को ख़ूब पढ़ा-लिखा कर एक अमीर व्यक्ति बनते देखना चाहते थे। अभिषेक भी शुरू से ही होनहार छात्र थे और पढ़ाई में हमेशा अव्वल रहते थे। साल 2008 में बीएससी की डिग्री प्राप्त करने के बाद उन्होंने आगे की पढ़ाई के लिए विदेश का रुख किया। अमेरिका के लुइसियाना स्टेट यूनिवर्सिटी से मास्टर्स (एम.एस) की और उसके बाद वहीं से अपनी पीएचडी की पढ़ाई भी पूरी की।

पीएचडी कम्पलीट करने के बाद साल 2013 में उनकी लुइसियाना स्टेट यूनिवर्सिटी में ही बतौर साइंटिस्ट नौकरी लग गई। वहाँ उन्होंने करीब 2 साल तक काम किया और साइंस में बहुत सारे रिसर्च भी किये। यूनिवर्सिटी की तरफ से अभिषेक को बहुत अच्छी तनख्वाह भी मिलती थी। अमेरिका जैसे शहर में इतनी अच्छी जॉब और 10 लाख की मोटी तनख्वाह के बावजूद डॉ अभिषेक का मन विदेश में नहीं लगा। उन्हें अपने घर और अपने देश की हमेशा याद आती थी। वे चाहते थे की अपने देश में रहकर ही कुछ ऐसा किया जाए जिससे खुद का विकास तो हो ही साथ ही साथ दूसरों को भी रोज़गार मुहैया करवा सकें। फिर क्या अभिषेक नें नौकरी से रिजाइन देकर अपने देश, अपने गाँव लौटने का मन बना लिया।

जब अभिषेक घर वापस लौटे और उन्होंने घर वालों को बताया कि उन्होंने नौकरी छोड़ दी है और गाँव में ही कुछ करना चाहते हैं। उनके घर वालों ने पहले तो इस बात पर आपत्ति जताई लेकिन बेटे की सोच के सामने उन्हें झुकना पड़ा। उनके समझाने के बाद घरवाले मान गए और उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहत भी किया। अभिषेक अपने गाँव में कृषि आधारित कोई बिज़नेस शुरू करना चाहते थे।

12 लाख के निवेश से अभिषेक ने 120 बकरियाँ खरीद अपने स्टार्टअप की शुरुआत की। उन्होंने बकरियों को बेहतर और पौष्टिक खाना देने के लिए बाज़ार के चारे की जगह खुद चारा उगाने को सोची। उन्होंने 6 एकड़ की ज़मीन पर मक्का, बाजरा आदि जैसी फसलों की बुआई शुरू कर दी और इन फसलों का उपयोग वे बकरियों के चारे के रूप में करते हैं। इससे बकरियों को शुद्ध व ताज़ा चारा भी मिल जाता है और उन्हें बाजार के मुकाबले खर्च भी कम पड़ता है।

करीब एक साल में ही उनकी मेहनत रंग लाने लगी और उनके फार्म में बकरियों की संख्या बढ़कर करीब दोगुनी हो गई। आज उनके पास 8 अलग-अलग नस्लों की करीब 350 बकरियाँ है, जिसमें अफ़्रीकी बोर, बेतट, सिरोह, जमुनापरी इत्यादि नस्ल शामिल है। अभिषेक एक बकरी बेचने पर औसतन 10 हज़ार रूपए कमाते हैं और पिछले साल उनकी कमाई 10 लाख से अधिक की थी।

उन्होंने बकरी पालन के अलावा अब मुर्गी पालन और ऑर्गेनिक फार्मिंग भी शुरू कर दी है। उन्होंने कई ग्रामीणों को अपने यहाँ रोज़गार भी दिया हुआ है और उन्हें अच्छी सैलेरी भी देते हैं। अभिषेक ने परम्परागत व्यापार को आधुनिक तरके से कर एक मिसाल कायम की है। आज उन्होंने यह साबित किया है कि पशुपालन भी एक मुनाफे का व्यापार हो सकता है, बस जरूरत है तो सही तरीके की। आज अभिषेक न सिर्फ लोगों को इसके लिए प्रोत्सहित करते हैं बल्कि वो और उनकी टीम मिलकर हज़ारों किसानों का मार्गदर्शन भी करती है। उन्होंने किसानों का एक ग्रुप बनाया है और अपने ग्रुप के माध्यम से वे किसानों के लिए मुफ़्त वर्कशॉप का आयोजन भी करते है। ताकि किसानों को इससे कुछ सीखने को मिले और वैज्ञानिक तरीके से खेती व पशुपालन कर वे तरक्की की राह पर अग्रसर हो सकें।