बिधान चंद्र राय का जन्म 1 जुलाई सन् 1882 को बिहार राज्य के पटना ज़िले में बांकीपुर में हुआ था। उनके पिता श्री प्रकाश चंद्र राय वहाँ के डिप्टी कलेक्टर के पद पर कार्यरत थे। बिधान चंद्र अपने माता पिता की पाँच संतानों में सबसे छोटे थे। कहा जाता है कि बिधान चंद्र के पूर्वज बंगाल के राजघराने से सम्बंधित थे और उन्होंने मुग़लों का जमकर मुकाबला किया था। यद्यपि कालांतर में राजशाही का वह प्रभाव जाता रहा तथा सरकारी नौकरी होते हुए भी प्रकाश चंद्र राय की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी।

बिधान चंद्र ने बचपन से ही अनुभव किया कि उनके धार्मिक प्रकृति के माता पिता उनको अच्छे संस्कार तथा आधारभूत शिक्षा तो दे सकते हैं, किंतु आगे का सफर उन्हें अपनी मेहनत और लगन से ही प्राप्त करना होगा। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा पटना के ही एक विद्यालय से हुई। जब वे मात्र 14 वर्ष के थे, तभी उनकी माता का देहांत हो गया। ऐसे में उन्होंने अपने भाई बहिनों के साथ घर का कार्य स्वंय करना प्रारम्भ किया और अपने पिता को परिवार चलाने में सहयोग दिया।

पटना विश्वविद्यालय से उन्होंने गणित ऑनर्स की बी.ए. की परीक्षा उतीर्ण की। इस समय उन्हें एक सरकारी नौकरी का प्रस्ताव भी मिल रहा था, किंतु उन्होंने इंजीनियरिंग या डॉक्टरी के क्षेत्र में से किसी एक में जाने का विचार किया। उन्होंने शिवपुर इंजीनियरिंग कॉलेज और कलकत्ता मेडिकल कॉलेज में प्रवेश के लिए प्रार्थना पत्र भेजे। दोनों ही स्थानों पर उनके प्रार्थना पत्र स्वीकार कर लिए गये, किंतु कलकत्ता मेडिकल कॉलेज का उत्तर पहले प्राप्त होने पर वे सन् 1901 में कोलकाता चले गये।

कलकत्ता मेडिकल कॉलेज में उनका पहला वर्ष बहुत ही आर्थिक संकट में गुजरा। पिता द्वारा भेजे गये कुछ रुपयों से वे बड़ी मितव्ययिता से अपना काम चलाते थे। दूसरे वर्ष जबकि उनके पिता भी सेवानिवृत्त हो गये, तब यह आर्थिक संकट और भी गहरा गया। उन्होंने बहुत से कष्टों को झेलकर भी अपना अध्ययन करते रहे, इसका अनुमान इस तथ्य से लगता है कि पाँच वर्षों के अपने अध्ययन काल में वे सिर्फ़ पाँच रुपये की पुस्तक ही ख़रीद सके थे। शेष पुस्तकों के लिए उन्हें पुस्तकालय और अपने मित्रों पर निर्भर रहना पड़ता था।

बिधान चंद्र ने अपने व्यवहार और शैक्षिक प्रतिभा के बल पर कॉलेज के प्राध्यापकों और प्रधानाचार्य को बहुत प्रभावित किया। उनके प्रधानाचार्य कर्नल ल्यूकिस उनके प्रेरणा स्रोत तो बने ही, उन्होंने डॉ. राय को आगे बढ़ने में बहुत सहयोग दिया। सन् 1906 में उन्होंने एल.एम.एस. की परीक्षा उत्तीर्ण की और प्रांतीय स्वास्थ्य सेवा में नियुक्त हो गये। एक चिकित्सक के रूप में जहाँ उन्होंने रोगियों का उपचार करने में कठिन परिश्रम और समर्पण से कार्य किया, वहीं अपना डॉक्टरी का अध्ययन भी करते रहे।

सन् 1909 में उन्होंने एम. डी. की परीक्षा उत्तीर्ण की और कर्नल ल्यूकिस के सहयोग से उच्च शिक्षा के लिए इंग्लैंड के ‘सेंट बाथोलोम्यूस’ में अध्ययन करने लगे। मात्र 1200 रुपये लेकर विदेश गये राय ने वहाँ अस्पताल में नर्स के रूप में काम करके किसी प्रकार अपनी पढ़ाई और रहने खाने का खर्चा चलाया।

उन्होंने अपनी मेहनत और लगन से समय से पूर्व ही एम.आर.सी.पी. और एफ.आर.सी.एस. की परीक्षा उत्तीर्ण की और सन् 1911 में वह भारत लौट आये। भारत में उन्होंने कलकत्ता मेडिकल कॉलेज, कैंपबेल मेडिकल स्कूल और कारमाइकेल मेडिकल कॉलेज में क्रमवार अध्यापन कार्य किया। सन् 1916 में वह कलकत्ता विश्वविद्यालय के फैलो चुने गये।

4 फ़रवरी, 1961 में वरिष्ठ चिकित्सक, विद्वान् शिक्षाविद, निर्भीक स्वतंत्रता सेनानी, कुशल राजनीतिज्ञ और प्रसिद्ध समाज सेवक डॉक्टर बिधान चंद्र राय को भारत सरकार द्वारा ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया गया।

1 जुलाई, 1962 को 80 वर्ष की आयु में दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया। डॉ. राय की मृत्यु पर पूरा राष्ट्र शोक में डूब गया। महान् समाज सेविका मदर टेरेसा स्वंय उनकी मृत्यु पर बहुत दुखी हुईं, क्योंकि जब तक डॉ. राय जीवित रहे, उन्होंने मदर टेरेसा और उनकी संस्था के कार्यों को यथासंभव सहयोग दिया था।

उनकी मृत्यु के पश्चात् उनकी स्मृति और सम्मान में 1967 में दिल्ली में डॉ. बी.सी.राय स्मारक पुस्तकालय और वाचनालय की स्थापना की गयी। सन् 1976 में उनके नाम पर ‘ डॉ. बी.सी.राय राष्ट्रीय पुरस्कार’ आरम्भ किया गया। यह पुरस्कार चिकित्सा, दर्शन, साहित्य, कला और राजनीति विज्ञान के लिए दिया जाता है।