Homi Jehangir Bhabha Birth Anniversary: होमी जहांगीर भाभा: जयंती पर जानें  खास बातें, सुलझ गया मौत का रहस्य?

होमी जहाँगीर भाभा भारत के एक प्रमुख वैज्ञानिक थे, जिन्होंने भारत के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम की कल्पना की थी। जब होमी जहाँगीर भाभा 29 वर्ष के थे और उपलब्धियों से भरे 13 वर्ष इंग्लैंड में बिता चुके थे। उस समय ‘कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय’ भौतिक शास्त्र के क्षेत्र में सर्वश्रेष्ठ स्थान माना जाता था। वहाँ पर श्री भाभा केवल पढ़ाई ही नहीं बल्कि कार्य भी करने लगे थे। जब अनुसंधान के क्षेत्र में श्री भाभा के उपलब्धियों भरे वर्ष थे तभी स्वदेश लौटने का अवसर उन्हें मिला। श्री भाभा ने अपने वतन भारत में रहकर ही कार्य करने का निर्णय लिया। उनके मन में अपने देश में विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में एक क्रांति लाने का जुनून था। यह डॉ. भाभा के प्रयासों का ही प्रतिफल है कि आज विश्व के सभी विकसित देशों भारत के नाभिकीय वैज्ञानिकों की प्रतिभा एवं क्षमता का लोहा माना जाता है।

होमी जहाँगीर भाभा का जन्म मुम्बई के एक सम्पन्न पारसी परिवार में 30 अक्टूबर 1909 को हुआ था। उनके पिता जे. एच. भाभा बंबई के एक प्रतिष्ठित बैरिस्टर थे। आज भारत में लगभग दो लाख पारसी हैं। ईसा की सातवीं शताब्दी में इस्लाम ने जब ईरान पर क़ब्ज़ा कर लिया, तो अपने धर्म की रक्षा के लिए तमाम पारसी परिवार भागकर भारत आ गए थे। तब से ये भारत में ही हैं और भारत को ही अपना वतन मानते हैं। पारसी समाज ने बड़े योग्य व्यक्तियों को जन्म दिया है।

डॉ. भाभा पढ़ाई में बचपन से ही बहुत तेज़ थे। 15 वर्ष की आयु में ही उन्होंने मुम्बई के एक हाईस्कूल से सीनियर कैम्ब्रिज की परीक्षा सम्मानपूर्वक पास की और बाद में उच्च शिक्षा के लिए ‘कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय’ गए। वहाँ भी उन्होंने अपनी असाधारण प्रतिभा का परिचय दिया।

डॉ. भाभा जब कैम्ब्रिज में अध्ययन और अनुसंधान कार्य कर रहे थे और छुट्टियों में भारत आए हुए थे तभी सितंबर 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध छिड़ गया। इस समय हिटलर पूरे यूरोप पर तेजी से क़ब्ज़ा करता जा रहा था और इंग्लैंड पर हमला सुनिश्चित दिखाई दे रहा था। इंग्लैंड के अधिकांश वैज्ञानिक युद्ध के लिये सक्रिय हो गए और पूर्वी यूरोप में मौलिक अनुसंधान लगभग ठप्प हो गया। ऐसी परिस्थिति में इंग्लैंड जाकर अनुसंधान जारी रखना डॉ. भाभा के लिए संभव नहीं था। डॉ. भाभा के सामने यह प्रश्न था कि वे भारत में क्या करें? उनकी प्रखर प्रतिभा से परिचित कुछ विश्वविद्यालयों ने उन्हें अध्यापन कार्य के लिये आमंत्रित किया। अंततः डॉ. भाभा ने ‘भारतीय विज्ञान संस्थान’ (IISc) बैंगलोर को चुना जहाँ वे भौतिक शास्त्र विभाग के प्राध्यापक के पद पर रहे। यह उनके जीवन का महत्त्वपूर्ण परिवर्तन था। डॉ. भाभा को उनके कार्यों में सहायता के लिए ‘सर दोराब जी टाटा ट्रस्ट’ ने एक छोटी-सी राशि भी अनुमोदित की थी। डॉ. भाभा के लिए कैम्ब्रिज की तुलना में बैंगलोर में काम करना मुश्किल था। कैम्ब्रिज में वे सरलता से अपने वरिष्ठ लोगों से सम्बन्ध बना लेते थे परंतु बैंगलोर में यह उनके लिए चुनौतीपूर्ण था। उन्होंने अपना अनुसंधान कार्य जारी रखा और धीरे-धीरे भारतीय सहयोगियों से संपर्क भी बनाना शुरू किया। उन दिनों ‘भारतीय विज्ञान संस्थान’, बैंगलोर में ‘सर सी. वी. रामन’ भौतिक शास्त्र विभाग के प्रमुख थे। सर रामन ने डॉ. भाभा को शुरू से ही पसंद किया और डॉ. भाभा को ‘फैलो ऑफ़ रायल सोसायटी’ (FRS) में चयन हेतु मदद की।

बैंगलोर में डॉ. भाभा कॉस्मिक किरणों के हार्ड कम्पोनेंट पर उत्कृष्ट अनुसंधान कार्य कर रहे थे, किंतु वे देश में विज्ञान की उन्नति के बारे में बहुत चिंतित थे। उन्हें चिंता थी कि क्या भारत उस गति से उन्नति कर रहा है जिसकी उसे ज़रूरत है? देश में वैज्ञानिक क्रांति के लिए बैंगलोर का संस्थान पर्याप्त नहीं था। डॉ. भाभा ने नाभिकीय विज्ञान के क्षेत्र में विशिष्ट अनुसंधान के लिए एक अलग संस्थान बनाने का विचार बनाया और सर दोराब जी टाटा ट्रस्ट से मदद माँगी। यह सम्पूर्ण भारतवर्ष के लिए वैज्ञानिक चेतना एवं विकास का निर्णायक मोड़ था

डॉ. भाभा ने अपनी वैज्ञानिक और प्रशासनिक ज़िम्मेदारियों के साथ-साथ TIFR की स्थायी इमारत की भी ज़िम्मेदारी उठायी। भाभा ने इसे विश्व के सर्वश्रेष्ठ संस्थानों में खड़ा करने का सपना देखा। उन्होंने अमेरिका के जाने-माने वास्तुकार को इसकी योजना बनाने के लिये आमंत्रित किया। इस इमारत का शिलान्यास 1954 में नेहरू जी ने किया। डॉ. भाभा ने इमारत निर्माण के हर पहलू पर बारीकी से ध्यान दिया। अंततः 1962 में इस इमारत का उद्घाटन नेहरू जी के कर कमलों द्वारा हुआ।

सन 1966 में डॉ. भाभा के अकस्मात निधन से देश को गहरा आघात पहुँचा। उनके द्वारा डाली गई मज़बूत नींव के कारण ही उनके बाद भी देश में परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम अनवरत विकास के मार्ग पर अग्रसर है। डॉ. भाभा के उत्कृष्ट कार्यों के सम्मान स्वरूप तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी जी ने परमाणु ऊर्जा संस्थान, ट्रॉम्बे (AEET) को डॉ. भाभा के नाम पर ‘भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र’ नाम दिया। आज यह अनुसंधान केन्द्र भारत का गौरव है और विश्व-स्तर पर परमाणु ऊर्जा के विकास में पथप्रदर्शक हो रहा है।