सिखों के चौथे गुरु रामदास जी के पुत्र थे, पांचवे गुरु अर्जुनदेव जी। उनका जन्म 15 अप्रैल 1563 को हुआ। सिख संस्कृति को गुरु जी ने घर-घर तक पहुंचाने के लिए अथाह प्रयत्‍‌न किए अर्जुनदेव की मां का नाम भानी था। उनकी पत्नी का नाम गंगा जी और पुत्र का नाम हरगोविंद सिंह था। जो आगे चलकर सिखों के 6वें गुरु बने।

उस समय गुरु रामदास जी को जेठाजी के नाम से संबोधित किया जाता था। वहीं, अर्जुनदेव जी का छोटी-सी उम्र में भी धार्मिक कार्यों के प्रति काफी रुझान था।

गुरु ग्रंथ साहिब का संपादन गुरु अर्जुन देव जी ने भाई गुरदास की सहायता से 1604 में किया था। गुरु अर्जुन देव के स्वयं के लगभग 2000 शब्द गुरु ग्रंथ साहब में संकलित हैं।

गुरु अर्जुनदेव ने ‘अमृत सरोवर’ का निर्माण कराकर उसमें ‘हरमंदिर साहब’ का निर्माण भी कराया, जिसकी नींव सूफ़ी संत मियां मीर के हाथों से रखवाई गई थी। उन्होंने एक नगर भी बसाया जिसका रखा गया तरनतारन नगर। अर्जन देव की रचना ‘सुषमनपाठ’ का सिक्ख नित्य पारायण करते हैं।

उन्होंने अपनी जिंदगी में कई दुःखों को महसूस किया। लेकिन वे शांत रहे, उनका मन एक बार भी कष्टों से नहीं घबराया। गुरु जी ने कष्ट में हंसते-हंसते यही अरदास करते थे कि, तेरा कीआ मीठा लागे। हरि नामु पदारथ नानक मांगे।

उन्होने अपने जीवन काल मे समाज के सुधार का कार्य किया परंतु मुगलो को यह भी पसंद नही था। इसलिए जहाँगीर ने लाहौर जो की अब पाकिस्तान में है, में 30 मई 1606 को अत्यंत यातना देकर उनकी हत्या करवा दी। आज उनके शहीदी दिवस पर शत शत नमन।