भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मंडी के शोधकर्ताओं ने बेकार प्लास्टिक बोतलों से फेस मास्क बनाने की स्वदेशी तकनीक विकसित की है। स्कूल ऑफ इंजीनियरिंग में असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. सुमित सिन्हा राय ने अपने शोधार्थी आशीष काकोरिया और शेषनाग सिंह चंदेल के साथ बेकार प्लास्टिक बोतल से नैनो-नॉनवोवन मेम्ब्रन की एक पतली परत विकसित है। कणों को फिल्टर करने में एन-95 रेस्पिरेटर और मेडिकल मास्क के बराबर सक्षम है।

इस प्रोडक्ट का विकास और परीक्षण आईआईटी मंडी के मल्टीस्केल फैब्रिकेशन और नैनो टेक्नोलॉजी लेबोरेटरी में किया गया है। आईआईटी मंडी के शोधकर्ताओं की इस पहल से प्लास्टिक प्रदूषण कम होगा और प्लास्टिक कचरे से अधिक कीमती चीज बन जाएगी। यह धुआं फिल्टर करने और निरंतर वायु स्वच्छ करने में भी काम आएगी।

डॉ. सुमित सिन्हा और टीम ने प्लास्टिक बोतलों की इलेक्ट्रोस्पिनिंग कर बारीक टुकड़े किए और इन्हें कई सॉल्वैंट के घोल में डाला। फिर इस घोल से नैनोफाइबर प्राप्त किए। बैक्टीरिया और संक्रामक तत्वों को हटाकर नैनोफाइबर के उपयोग के सुरक्षा मानकों को पूरा किया। इस तरह बने मास्क से बाजार के मास्क की तुलना में सांस लेना आसान होता है। डॉ. सुमित ने फिल्टर मेम्ब्रेन बनाने की तकनीक के प्रोविजनल पेटेंट के लिए आवेदन कर दिया है।

आईआईटी मंडी की ईडब्ल्यूओके सोसायटी की मदद से ये मेम्ब्रेन दो पतले सूती कपड़ों को सिलकर फेस मास्क बनाए गए। ये मास्क 3-प्लाई मेडिकल फेस मास्क से अधिक कारगर हैं। यह टीम लेबोरेटरी स्तर पर प्रति दिन 20 मास्क मेम्ब्रेन बनाने में सक्षम हो गई है। नैनोफाइर वाले 3-प्लाई सेमी-रीयूजबल मास्क धुलने और बार-बार पहनने योग्य हैं। लेबोरेटरी स्तर पर निर्माण सामग्री की लागत 12 रुपये प्रति मास्क है।

 

Source: Amar Ujala