जिस उम्र में बच्चे स्कूल जाते हैं, उस उम्र में रायसिंह खेतों में अपने माता-पिता की मदद करते थे। घर में छोटे-बड़े काम संभालने से लेकर, भेड़-बकरियां चराने तक, किसी भी काम में वे पीछे नहीं हटे। रायसिंह का बचपन भले ही कितनी भी ग़रीबी में बीता हो पर वे ज़िंदगी से कभी मायूस नहीं हुए। उन्होंने सिर्फ़ मेहनत की और आज उसी मेहनत का नतीजा है कि वे एक कंपनी के मालिक हैं और देश-विदेशों में उनकी पहचान एक आविष्कारक के तौर पर है।

राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले में थालडका गाँव के रहने वाले रायसिंह बताते हैं, “मैं कभी खुद तो स्कूल नहीं जा पाया लेकिन छोटे भाई-बहनों की पढ़ाई जारी रखवाई। मुझे पढ़ने का शौक था तो मैं अपने भाई से ही पढ़ लिया करता था। फिर खेतों में काम करते वक़्त टीलों पर मिट्टी से क, ख, ग… लिखता, गुणा-भाग करता। मैंने दसवीं के पेपर देने की भी सोची पर वो वक़्त ही ऐसा था कि कुछ हो नहीं पाया।”

रायसिंह को हर दिन कुछ न कुछ नया सीखने का चाव था। उनके गाँव में पहली बार जब बस चली तो उन्होंने मिट्टी से ही उस बस का मॉडल बना लिया। ऐसे ही जब उन्होंने पहली बार मोटरसाइकिल देखी तो उनके मन में सबसे पहले ख्याल आया कि यह कैसे बनी होगी?

साल 1979 में जब उनके यहाँ पहली बार इंजन आया तो उसे देखकर रायसिंह बहुत ही उत्साहित हो गए। अपने काम के साथ-साथ हर दिन वे कुछ वक़्त इंजन के अलग-अलग पार्ट्स के बारे में जानने में लगाते। लगभग एक साल में ही वे इंजन के एक्सपर्ट हो गए और न सिर्फ़ इंजन के बल्कि वे तो ट्रेक्टर के काम करने के लॉजिक और इंजन में आई कमी को दूर करने के तरीके भी खुद ही देखकर सीख गए।

“इसी तरह मैंने ट्रेक्टर भी ठीक करना सीख लिया। हमें अपने घर या खेत में किसी भी चीज़ की मरम्मत कराने के लिए बाहर से किसी मिस्त्री या मैकेनिक को बुलाने की ज़रूरत नहीं पड़ती थी। मैं खुद ही ये सब काम देख लेता था। इस तरह जब गाँव में दूसरे लोगों ने देखा तो वे भी अपने इंजन और ट्रेक्टर सही करवाने के लिए मेरे पास आने लगे। मैं आपको इतना कह सकता हूँ कि मुझे इंजन की भाषा समझ में आती है। मैं इंजन की आवाज़ से ही पता लगा लेता हूँ कि उसके किस पार्ट में खराबी है,”।

उन्होंने साल 1991 के आस-पास ट्रेक्टर, जीप, इंजन आदि सही करने के लिए अपनी ‘दहिया वर्कशॉप’ शुरू की। उस समय डीज़ल इंजन की बढ़ती मांग को देखकर उन्होंने इसे एलपीजी इंजन में तब्दील करना शुरू किया क्योंकि डीज़ल काफ़ी महंगा हो रहा था। उनका यह एक्सपेरिमेंट सफल रहा।

(जैविक कचरे से चलता है यह गैसीफायर)

उन्होंने आगे बताया, “एलपीजी इंजन बनाने के बाद मुझे लगा कि क्या हम लकड़ी जलने पर निकलने वाली गैस से इंजन चला सकते हैं? मैंने ऐसी मशीन बनाने पर काम किया जो कि लकड़ी के वेस्ट को (बायोमास) को गैस में तब्दील कर सकती है। इस मशीन को बनाने के बाद मुझे पता चला कि ऐसी मशीन को ‘गैसीफायर’ कहते हैं। मुझे एक सफल बायोमास गैसीफायर बनाने के लिए कई बार एक्सपेरिमेंट करने पड़े।”

उन्होंने कई बार एक्सपेरिमेंट करके एक फाइनल गैसीफायर सिस्टम तैयार किया जिससे कि इंजन को बिना किसी परेशानी के 100-150 घंटे तक चलाया जा सकता है। आपको बार-बार फ़िल्टर खोलकर साफ़ करने की भी ज़रूरत नहीं है।

रायसिंह बताते हैं कि, उन्होंने 1 सितंबर 2001 को अपना पहला ‘बायोमास गैसीफायर’ से संचालित इंजन सफलतापूर्वक चलाया। शुरू में अपने गाँव में ही बायोमास गैसीफायर लगाया और लोगों को अपने घरों और खेतों से निकलने वाले बायो-वेस्ट को इसमें डालने के लिए कहा। इस बायो-वेस्ट को जलाने पर जितनी भी गैस उत्पन्न होती उससे हम खेतों में इंजन चला लिया करते थे।

उनका यह इनोवेशन जब उनके अपने गाँव में काफी सफल रहा तो उन्हें बाहर से लोगों ने सम्पर्क करना शुरू किया। इस तरह उनके इस इनोवेशन की चर्चा नेशनल इनोवेशन फाउंडेशन तक पहुँच गई। नेशनल इनोवेशन फाउंडेशन की टीम ने उनके बायोमास गैसीफायर को न सिर्फ सम्मानित किया बल्कि उसे और भी अच्छे स्तर पर मॉडिफाई करने के लिए रायसिंह की मदद भी की।

नेशनल अवॉर्ड मिलने के बाद उन्हें भारत के बाहर, जर्मनी, केन्या, घाना, दक्षिण अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों से भी इस बायोमास गैसीफायर बनाने के मौके मिलने लगे। इतना ही नहीं, उन्हें राष्ट्रपति भवन में पूर्व राष्ट्रपति और वैज्ञानिक एपीजे अब्दुल कलाम के सामने भी अपने इस अविष्कार को दिखाने का मौका मिला।

“मुझे कई जगह से ऑर्डर मिलने लगे और फिर IIT, इंजीनियरिंग कॉलेज, ITI आदि के छात्र भी वर्कशॉप के लिए मेरे पास आने लगे। ऐसे में, गाँव में ही रहकर काम करना थोड़ा मुश्किल था। इसलिए मेरी बेटी ने मुझे सलाह दी कि हमें जयपुर शिफ्ट करना चाहिए ताकि किसी भी सुविधा की कमी के चलते मेरा यह काम न रुके।”

साल 2010 में रायसिंह अपने परिवार के साथ जयपुर आकर बस गए। यहाँ आकर उन्होंने Enersol Biopower Pvt Ltd. के नाम से अपनी कंपनी शुरू की। इस कंपनी को आज उनके तीनों बच्चे, दो बेटियाँ और एक बेटा मिलकर संभाल रहे हैं।

उनकी बेटी डॉ. राज दहिया खुद को बहुत खुशनसीब मानती हैं कि उनके पिता का आविष्कार न सिर्फ़ समाज के लिए बल्कि पर्यावरण के लिए भी उपयोगी है। वे कहती हैं, “पापा के साथ काम करके मुझे बहुत कुछ नया सीखने को मिला। आज मैं कोई साधारण नौकरी नहीं कर रही, मैं बहुत खुश हूँ कि पापा की वजह से मैं हमारे समाज, पर्यावरण और देश के लिए कुछ अच्छा कर पा रही हूँ।”

आज उनकी कंपनी का सालाना टर्नओवर  करोड़ रुपए से ऊपर है। उन्होंने अब तक पूरी दुनिया में 225 से ज़्यादा मशीनें बेची हैं और अभी भी उन्हें लगातार ऑर्डर मिल रहे हैं।

इस एक मशीन से आप न सिर्फ़ अपने खेतों में ट्यूबवेल चला सकते हैं बल्कि अपने घर में बिजली ला सकते हैं, वाटर पंप, आटा चक्की, आरा मिल आदि भी चला सकते हैं। इस मशीन में 1 किलोग्राम बायोवेस्ट डालने पर 1 किलोवाट उर्जा उत्पन्न होती है जिससे आप एक घंटे तक इंजन चला सकते हैं।

इस मशीन को इस्तेमाल करने से एक तो बायो-वेस्ट अर्थात खेतों से निकलने वाला कचरे, सब्ज़ी-मंडी में निकलने वाले कचरे और रसोई से निकलने वाले कचरे का सही तरीके से दुबारा इस्तेमाल हो रहा है। दूसरा, इससे हमें अन्य ईंधन जैसे कि डीज़ल, पेट्रोल पर ज़्यादा निर्भर रहने की ज़रूरत नहीं है और साथ ही, यह आर्थिक रूप से किफ़ायती भी है।

आगे बात करते हुए डॉ. राज कहती हैं कि बायोमास गैसीफायर के आलावा अब वे बायोमास कुक स्टोव, बर्नर, पैलेट मशीन आदि भी बना रहे हैं। उनका उद्देश्य कम से कम लागत में आम लोगों के लिए ऐसे इनोवेशन तैयार करना है जिससे कि पर्यावरण को भी संरक्षित किया जा सके।

अंत में वह सिर्फ़ इतना ही कहती हैं कि यदि आपके आस-पास कोई बच्चा कुछ अलग सोचता है, कुछ अलग करने की कोशिश करता है तो उसे प्रोत्साहित करें। उसका सहयोग दें क्योंकि हो सकता है कि एक दिन वह भी अच्छे इनोवेटर के रूप में उभरे।

राय सिंह दहिया की मशीन का मूल्य उर्जा की क्षमता के आधार पर है। यदि आप इस मशीन के बारे में अधिक जानकारी चाहते हैं या फिर इसे खरीदना चाहते हैं तो रायसिंह दहिया से 9460188117 पर संपर्क कर सकते हैं!

 

संपादन: भगवती लाल तेली

Credits: The Better India