किस्सा काकोरी कांड का (सांकेतिक तस्वीर)

भारत के स्वाधीनता आंदोलन में काकोरी कांड की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। लेकिन इसके बारे में बहुत ज्यादा जिक्र सुनने को नहीं मिलता। इसकी वजह यह है कि इतिहासकारों ने काकोरी कांड को बहुत ज्यादा अहमियत नहीं दी। लेकिन यह कहना गलत नहीं होगा कि काकोरी कांड ही वह घटना थी जिसके बाद देश में क्रांतिकारियों के प्रति लोगों का नजरिया बदलने लगा था और वे पहले से ज्यादा लोकप्रिय होने लगे थे।

गांधी जी द्वारा असहयोग आंदोलन को वापस ले लेने की घटना ने पूरे देश में असंतोष का माहौल पैदा कर दिया था ।आजादी के इतिहास में असहयोग आंदोलन के बाद काकोरी कांड को एक बहुत महत्वपूर्ण घटना के तौर पर देखा जा सकता है, क्योंकि इसके बाद आम जनता अंग्रेजी राज से मुक्ति के लिए क्रांतिकारियों की तरफ और भी ज्यादा उम्मीद से देखने लगी थी।

9 अगस्त 1925 को क्रांतिकारियों ने काकोरी में एक ट्रेन में डकैती डाली थी। इसी घटना को ‘काकोरी कांड’ के नाम से जाना जाता है। क्रांतिकारियों का मकसद ट्रेन से सरकारी खजाना लूटकर उन पैसों से हथियार खरीदना था ताकि अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध को मजबूती मिल सके, काकोरी ट्रेन डकैती में खजाना लूटने वाले क्रांतिकारी देश के विख्यात क्रांतिकारी संगठन ‘हिंदुस्तान रिपब्लिक एसोसिएशन’ (एचआरए) के सदस्य थे।

इस लूट के लिए 8 अगस्त 1925 को एच आर ए के दफ्तर में मीटिंग होती है जिसमें अशफाक उल्ला खान कयामत था कि अभी हमें सरकार के खिलाफ सीधे तौर पर हमला नहीं करना चाहिए क्योंकि अभी हमारे संगठन पूरी तरह से मजबूत नहीं है और इससे हमारे संगठन को नुकसान हो सकता है लेकिन फिर भी ट्रेन लूटने की यह योजना बैठक में बहुमत से पास हो गया।

इस ट्रेन डकैती में कुल 4601 रुपये लूटे गए थे। इस लूट का विवरण देते हुए लखनऊ के पुलिस कप्तान इंग्लिश ने 11 अगस्त 1925 को कहा, ‘क्रांतिकारी खाकी कमीज और हाफ पैंट पहने हुए थे। उनकी संख्या 25 थी। यह सब पढ़े-लिखे लग रहे थे। पिस्तौल में जो कारतूस मिले थे, वे वैसे ही थे जैसे बंगाल की राजनीतिक क्रांतिकारी घटनाओं में प्रयुक्त किए गए थे।’

यह घटना अंग्रेजों के गाल पर एक जोरदार तमाचा था जो अंग्रेज भारतीयों को असहाय और कमजोर समझा करते थे, उन्हें अब यह पता चल गया था कि हम लोग आजादी के लिए कुछ भी कर सकते हैं इससे अंग्रेजी सरकार पूरी तरह से हिल गई थी। इस डकैती में एचआरए के केवल 10 लोग शामिल थे। इस घटना के बाद अंग्रेजों ने सभी क्रांतिकारियों को पकड़ लिया परंतु उसमें से केवल एक क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद जी को वह नहीं पकड़ पाए।

सभी क्रांतिकारियों पर राजद्रोह का मुकदमा चलाया गया और इस मुकदमे में रामप्रसाद ‘बिस्मिल’, राजेंद्रनाथ लाहिड़ी, रोशन सिंह और अशफाक उल्ला खां को फांसी की सजा सुनाई गई। शचीन्द्रनाथ सान्याल को कालेपानी और मन्मथनाथ गुप्त को 14 साल की सजा हुई। योगेशचंद्र चटर्जी, मुकंदीलाल जी, गोविन्द चरणकर, राजकुमार सिंह, रामकृष्ण खत्री को 10-10 साल की सजा हुई। विष्णुशरण दुब्लिश और सुरेशचंद्र भट्टाचार्य को सात और भूपेन्द्रनाथ, रामदुलारे त्रिवेदी और प्रेमकिशन खन्ना को पांच-पांच साल की सजा हुई।

सन 1927 में चारों क्रांतिकारियों को फांसी की सजा दे दी गई। चारों क्रांतिकारी हंसते हुए फांसी के तख्ते पर झूल गए आज जब हम इस घटना के बारे मे ध्यान करते हैं, तब हमें पता चलता है कि जो 15 अगस्त को आजादी मिली वह केवल एक के प्रयत्न से नहीं मिली है, उसमें ऐसे क्रांतिकारी सैकड़ों, हजारों थे जिन्होंने अपना सर्वस्व बलिदान किया तब जाकर हमें आजादी मिली इस आजादी का बहुत महत्व है आजादी का पर्व भी निकट है हम सब इस घटना को इस घटना में शहीद हुए क्रांतिकारियों का ध्यान करें और राष्ट्र के प्रति अपनी भावना ओर प्रबल करें जिससे कि राष्ट्र उन्नति पथ पर अग्रसर हो सके।

जय हिंद जय भारत