हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय शिमला से स्नातक की डिग्री हासिल करने के बाद सरकारी और निजी क्षेत्र में रोजगार का प्रयास किया पर कामयाबी नहीं मिली। लेकिन इसी नाकामी से सफलता का मंत्र सीख लिया। औषधीय पौधों की खेती से न केवल आत्मनिर्भर बने बल्कि 28 अन्य लोगों को भी प्रेरित किया है। अब प्लांट लगाकर करीब 200 लोगों को रोजगार मुहैया करवा रहे हैं। बात हो रही है कांगड़ा जिले के जसवां परागपुर विधानसभा क्षेत्र के तहत मगरू गांव के 33 वर्षीय युवा विपिन की। वह अब बेरोजगार युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत बने हैं।

यूं शुरू हुआ जीवन का संघर्ष

नौकरी न मिलने से मायूस नहीं हुआ। मन में औषधीय पौधों की खेती करने का ख्याल आया। बागवानी विभाग से संपर्क किया। विभाग के एक ग्रुप के साथ राजस्थान के बीकानेर और जयपुर गया और वहां औषधीय खेती बारे में विस्तार से जाना। वर्ष 2010-2011 में एलोबेरा, अश्वगंधा, सफेद मुसली, सर्पगंधा व तुलसी की खेती आठ एकड़ भूमि पर शुरू कर दी।

शुरू में मुश्किलें आई, लेकिन कड़ी मेहनत के दम पर दो वर्ष बाद मेडिसनल प्लांट लगाकर कच्चा माल पंजाब में बेचना शुरू कर दिया। शुरुआती दौर में परेशानियां हुई लेकिन अब  कॉस्मेटिक इंडस्ट्री के काङ्क्षरदे घर से उत्पाद ले जाते हैं। वर्तमान में पंजाब, हिमाचल, दिल्ली व हरियाणा समेत कई राज्यों में औषधीय उत्पादों की काफी मांग है।

स्टेट मेडिसनल बोर्ड से किया है करार

औषधीय पौधों की खेती से अब विपिन की सालाना आय 10 लाख के करीब है। साथ ही क्षेत्र के 28 बेरोजगार युवाओं को औषधीय पौधों की खेती के लिए सहायता की है। साथ ही प्लांट लगाकर 200 लोगों को रोजगार भी मुहैया करवा रहे हैं। 2018-19 में स्टेट मेडिसनल बोर्ड से इनका करार हुआ है।

औषधीय खेती युवाओं के लिए बेहतर विकल्प

उत्तर भारत के सात राज्यों में औषधीय खेती की जिम्मेदारी है। हरेक राज्य में युवाओं व प्रगतिशील किसानों को खेती के लिए प्रेरित किया जा रहा है। मंडी जिले के जोगेंद्रनगर में स्थित मेडिसनल बोर्ड मुख्यमंत्री स्टार्टअप कार्यक्रम के तहत युवाओं को जोडऩे के लिए कार्य कर रहा है। देशभर में दवाओं के लगभग 9000 कारखाने हैं। औषधीय खेती युवाओं को भविष्य बनाने के लिए बेहतर विकल्प है। 

-अरुण चंद, क्षेत्रीय निदेशक नेशनल मेडिसनल बोर्ड।

 

Source: Dainik Jagran