भूमिका
खादी ने भारत की स्वंतत्रता के आंदोलन में स्वदेशी का भाव पैदा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। समय समय पर विदेशी वस्त्रों की होली जलाना विरोध का प्रमुख तरीका हुआ करता था। फिर गांधी जी का चरखा तो हम सब को याद होगा ही। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भी भारत के सामाजिक कार्यकर्ताओं व राजनेताओं द्वारा खादी वस्त्रों का प्रयोग एक प्रतीक के रूप में किया जाना इस बात का प्रमाण है कि खादी आज भी भारतीयता की पहचान के रूप में कहीं ना कहीं स्थापित है।

प्रारम्भ
खादी ग्रामद्योग केंद्र (KVIC) द्वारा उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2019 में खादी का कुल व्यवसाय ₹74323 करोड़ तक पहुंच गया है तथा पिछले पांच वर्षों में खादी की बिक्री में 145% की वृद्धि दर्ज की गई है। इसी अवधि में खादी से देश के लगभग 21 लाख लोगों को रोजगार भी प्राप्त हुआ है। एक वस्त्र के रूप में पुन: प्रचलित होने में  न केवल वर्तमान केंद्रीय सरकार की नीतियों वरन् अनेकों ऐसे युवा उद्यमियों की भी भूमिका है जो दृढ़ इच्छाशक्ति से देश और समाज का रूप बदलने में लगे हैं। ऐसा ही एक स्वदेशी उद्यम है – KhaDigi जिसकी संस्थापक हैं युवा उद्यमी उमंग श्रीधर

Umang Shridhar

(उमंग श्रीधर)

उमंग श्रीधर मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में किशनगंज जिले में जायरा व मोरैना नामक जिले, जो कभी डकैतों की समस्या से सर्वाधिक पीड़ित थे, में जन्मी व पली-बढ़ी व दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक हुई। परन्तु प्रारंभिक जीवन ग्राम में बीतने के कारण से वह गांव में आने वाली समस्याओं विशेषत: महिलाओं के बुरी आर्थिक दशा के बारे में अच्छी तरह से समझने के कारण से उनके मन में यह विश्वास था कि स्थानीय लोगों के साथ मिलकर ही कोई रोजगार करना चाहिए ताकि इनकी आर्थिक स्थिति में भी सुधार आ सके। राष्ट्रीय फैशन तकनीकी संस्थान (NIFT) से पढ़ाई करने के बाद तथा दो वर्षो तक विषय की अच्छी तरह जानकारी लेने के पश्चात वर्ष 2013 में खादी आधारित वस्त्रों का व्यवसाय करना शुरू किया।

KhaDigi यह नाम रखने के पीछे भी एक कहानी है। वर्ष 2015 की बात है, जब भारत के कपड़ा मंत्रालय ने भुवनेश्वर में Design Sutra नामक एक प्रतियोगिता रखी। इस प्रतियोगिता में उमंग श्रीधर को दूसरा स्थान प्राप्त हुआ व वही से  खादी व डिजिटल प्रिंटिंग को आपस में मिलाकर (Khadi+Digital = KhaDigi) यह नाम आस्तित्व में आया। इस उद्यम का उद्देश्य है कि किस प्रकार सदियों से भारत की अपनी खादी को आज कल के युवाओं की पसंद बनाया जाए जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार को बढ़ाया जाए।

वर्तमान स्थिति
प्रारम्भ में KhaDigi ने खादी वस्त्रों का उत्पादन शुरू किया माहेश्वरी साड़ियों के लिए प्रसिद्ध माहेश्वरी नामक स्थान पर 70 के लगभग स्थानीय महिला कारीगरों के साथ। KhaDigi की शुरुआत सीमित संसाधनों के साथ हुई लेकिन बाद में जयपुर की कम्पनी स्टार्टअप ओएसिस ने इसका वित्त पोषण किया, जिससे इसका व्यवसाय बढ़ा। KhaDigi खादी वस्त्र आम उपभोक्ताओं के लिए न बनाकर कॉरपोरेट उपभोक्ताओं के लिए बनाती है। अब तक यह कम्पनी 15000 मीटर कपड़े का निर्माण कर चुकी है व इसकी मासिक आय लगभग 7,50,000 रुपये तक पहुंच चुकी है।

KhaDigi में यह परंपरा है कि कुल मूल्य का 45% कारीगरों व बुनकरों को उनकी लागत के रूप में दिया जाता है। कंपनी की मान्यता है कि ये बुनकर व कारीगर ही हैं जिनके हाथ की कला का परिणाम यह लाभ है। आज KhaDigi पांच राज्यो के 500 कारीगरों, जिनमें लगभग 70% महिलाएं हैं, के रोजगार का मुख्य कारण बन चुकी है। कम्पनी ने खादी को 15-40 वर्ष तक के लोगो में लोकप्रिय बनाने व वर्ष 2020 पूरे मध्य प्रदेश में इस प्रकार के दस केंद्र बनाने का लक्ष्य रखा है।

Umang Shridhar, the founder of KhaDigi is revolutionizing the ...

पुरस्कार
बहुत थोड़े से समय में ही इस कंपनी ने अनेक सफलताएं प्राप्त की हैं जिनमें से प्रमुख हैं- KhaDigi को भारतीय तकनीकी विकास बोर्ड द्वारा 15 सफलतम महिला संचालित तकनीक आधारित उद्योगों में शामिल किया जाना, नैटवेस्ट लंदन द्वारा वैश्विक महिला सामाजिक उद्यमिता (WISE) सूची में प्रथम 100 में शामिल किया जाना व स्टार्टअप ओएसिस तरह ENACTUS IIT दिल्ली द्वारा आयोजित Think Social प्रतियोगिता में देश के सर्वोच्च पांच स्टार्टअप्स में शामिल किया जाना प्रमुख है। इस प्रकार एक युवा उद्यमी द्वारा ग्राम विकास हेतु स्थानीय संसाधनों के प्रयोग से रोजगार बढ़ाने का यह एक सफल प्रयास है।