मदनलाल ढींगरा - विकिपीडिया

मदनलाल ढींगरा भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के क्रांतिकारी सेनानी थे। वे इंग्लैण्ड में अध्ययन कर रहे थे। जहां उन्होने कर्जन वायली नामक एक ब्रिटिश अधिकारी की गोली मारकर हत्या कर दी। यह घटना बीसवीं शताब्दी में भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन की कुछेक प्रथम घटनाओं में से एक है।

मदललाल ढींगरा का जन्म सन् 1883 में पंजाब में एक संपन्न हिंदु परिवार में हुआ था। उनके पिता सिविल सर्जन थे और अंग्रेजी रंग में पूरे रंगे हुए थे; परंतु माताजी अत्यन्त धार्मिक एवं भारतीय संस्कारों से परिपूर्ण महिला थीं। उनका परिवार अंग्रेजों का विश्वासपात्र था। जब मदनलाल को भारतीय स्वतंत्रता सम्बन्धी क्रान्ति के आरोप में लाहौर के एक विद्यालय से निकाल दिया गया, तो परिवार ने मदनलाल से नाता तोड लिया।

मदनलाल को एक क्लर्क रूप में, एक तांगा-चालक के रूप में और एक कारखाने में श्रमिक के रूप में काम करना पडा। वहां उन्होने एक यूनियन (संघ) बनाने का प्रयास किया; परंतु वहां से भी उन्हें निकाल दिया गया। कुछ दिन उन्होने मुम्बई में भी काम किया। अपनी बडे भाई से विचार विमर्श कर वे सन् 1906 में उच्च शिक्षा के लिए इंग्लैंड गये जहां युनिवर्सिटी कालेज लंदन में यांत्रिक प्रौद्योगिकी (Mechanical Engineering) में प्रवेश लिया। इसके लिए उन्हें उनके बडे भाई एवं इंग्लैंड के कुछ राष्ट्रवादी कार्यकर्ताओ से आर्थिक सहायता मिली।

लंदन में ढींगरा भारत के प्रख्यात राष्ट्रवादी विनायक दामोदर सावरकर एवं श्यामजी कृष्ण वर्मा के संपर्क में आए। वे लोग ढींगरा के प्रचण्ड देशभक्ति से बहुत प्रभावित हुए। मदनलाल उच्च शिक्षण हेतु लंडन में रहते थे। उस समय सावरकरजी भी वहीं पर थे, उस समय सावरकर जी को एक भोजन प्रसंग में रंगभेद का अनुभव हुआ। उन्हें अंग्रेजों द्वारा उनके साथ न बैठ अलग टेबल पर बैठने को कहा गया। ज्वलंत देशाभिमान और अत्यंत स्वाभिमानी सावरकर जी को यह बात सहन नहीं हुई और वह वहां से बाहर चले गए।

उस समय मदनलाल और उनका एक दोस्त वहां उपस्थित था। मदनलाल जी ने सावरकर जी को समझाने का प्रयत्न किया कि इस प्रकार के वर्तन की उन्हें आदत डालनी होगी। मदनलाल और सावरकर, यह इनकी प्रथम भेंट थी। भारत को स्वतंत्रता मिलने के लिए देशभक्तों ने अनेक मार्ग ढूंढे। अंग्रेजों पर दबाव बनाने के लिए क्रांतीकारी मार्ग से देशभक्तो ने टक्कर देने हेतु राष्ट्र रक्षा एवं ब्रिटिशों से मुक्तता के लिए क्रांतिकारी संगठनों का उदय हुआ।

ऐसा विश्वास किया जाता है कि सावरकर ने ही मदनलाल को अभिनव भारत मंडल का सदस्य बनवाया और हथियार चलाने का प्रशिक्षण दिया। ये लोग उस समय खुदीराम बोस, कन्नाई दत्त, सतिन्दर पाल और कांशी राम जैसे क्रान्तिकारियों को मृत्युदण्ड दिये जाने से बहुत क्रोधित थे। भारतीयों के लिए मातृभूमि को देने के लिए क्या है, तो वह स्वयं का रक्त ही है, ऐसा ढींगराजी का मानना था।

मदनलालजी के विचार अत्यंत स्पष्ट थे और वह उतने ही स्पष्टता से व्यक्त किया करते थे, वे विदेशी शस्त्रास्त्रों की सहायता से दास्यता में जकडे हुआ राष्ट्र को बचाने के लिए निःशस्त्र होकर रणभूमि में उतरकर सामना करना कठिन होने के कारण उन्होंने घात लगाकर हमला किया।

2 जुलाई सन् 1909 में लंडन के नेशनल इंडियन असोसिएशन के वार्षिकोत्सव में कर्जन आने वाला है, इस गोपनीय समाचार की जानकारी मदनलाल को हुई।

2 जुलाई सन् 1909 की शाम को इण्डियन नेशनल एसोशिएशन के वार्षिकोत्सव में भाग लेने के लिए भारी संख्या में भारतीय और अंग्रेज एकत्रित हुए। जब कर्जन वायली (भारत मामलों के सेक्रेटरी आफ स्टेट के राजनीतिक सलाहकार) अपनी पत्नी के साथ सभाग्रह में घुसे, ढींगरा ने उनके चेहरे पर पांच गोलियां दागी; इसमें से चार सही निशाने पर लगीं। ढींगरा ने अपने पिस्तौल से अपनी हत्या करनी चाही; परंतु उन्हें पकड लिया गया।

22 जुलाई को ढींगरा के प्रकरण की सुनवाई पुराने बेली कोर्ट में हुई। उनको मृत्युदण्ड दिया गया और 17 अगस्त सन् 1909 को फांसी दे दी गयी। इस महान क्रांतिकारी के रक्त से राष्ट्रभक्ति के बीज उत्पन्न हों यही अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।