भारत में मानव बीमारियों के इलाज के लिए आयुर्वेद के सदियों से हो रहे उपयोग का एक लंबा इतिहास रहा है। आयुर्वेद को सभी उपचार प्रणालियों की मां के रूप में भी जाना जाता है। आयुर्वेद को आमतौर पर हजारों वर्षों से मौखिक रूप से पढ़ाया जाता था और यह ज्ञान अनुयायियों के माध्यम से आगे बढ़ता गया।

आयुर्वेदिक कंपनी महर्षि आयुर्वेद की शुरुआत का मूल मंत्र से तिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती के उपदेश ‘जीवन ही आनंद है’ और ‘जीवन तक कठिन हो जाता है जब लोग प्रकृति के अनुरूप नहीं चलते हैं’ से जुड़ा हुआ है।

महर्षि महेश योगी ने योग, ध्यान और आयुर्वेद जैसे वैदिक विज्ञानों का प्रचार करने के साथ-साथ इस संदेश को फैलाने के जिम्मे को अपने ऊपर ले लिया। 1986 में शुरू हुए महर्षि आयुर्वेद को आनंद श्रीवास्तव द्वारा लोगों को उनके दुखों से छुटकारा दिलाने के उद्देश्य से बनाया गया था जिसका उद्देश्य एक ‘रोग-मुक्त समाज’ का निर्माण करना था।

योरस्टोरी के साथ बातचीत में आनंद कहते हैं, “मैं 1970 के दशक में महर्षि जी से जुड़ा था और उनकी शिक्षाओं का अनुयायी था। आयुर्वेद के प्रति मेरा झुकाव इस विज्ञान की प्रचुरता को देखकर वहाँ से शुरू हुआ। इसलिए महर्षि जी के आशीर्वाद से मैंने महर्षि आयुर्वेद को सामने लाकर इस ज्ञान और विज्ञान को फैलाने का विचार किया।”

यात्रा की शुरुआत आनंद कहते हैं, ‘दशकों तक आयुर्वेदिक दवाओं को छोटे रैपिंग पेपरों में बेचा जाता था और उनका प्रचलन सीमित था। भले ही पारंपरिक दवाएं सदियों से मौजूद थीं, लेकिन बहुत कम लोग थे जो ज्ञान का प्रसार कर रहे थे।’

“महर्षि जी हमें बताते थे कि आयुर्वेद में समाज से बीमारी को खत्म करने की क्षमता है। आप देखते हैं आधुनिक चिकित्सा केवल लक्षणों को दबाती है या संतुलित करती है, यह ठीक नहीं है। आयुर्वेदिक उपचार में लंबा समय लगता है, लेकिन इसे ठीक करने की संभावना है क्योंकि यह एक व्यक्ति पर काम करता है न कि बीमारी पर।”

ब्रांड महर्षि आयुर्वेद को वैदिक ग्रंथों से दवाओं के लिए शास्त्रीय सूत्र विरासत में मिले। आनंद ने डॉ. बलराज महर्षि और अन्य लोगों के साथ मिलकर ब्रांड के लिए दवाओं का विकास किया। महर्षि आयुर्वेद स्थानीय स्तर पर जड़ी-बूटियों- जैसे राजस्थान, हिमाचल प्रदेश और मध्य प्रदेश से आंवला; मध्य प्रदेश से हरहर; राजस्थान और उत्तर प्रदेश से अश्वगंधा और शतावरी आदि एकत्रित करती है।

चुनौतियां वर्तमान वैश्विक आयुर्वेद उद्योग 5 बिलियन डॉलर में खड़ा है, जिसमें 16 प्रतिशत का सीएजीआर है। यह वृद्धि अगले दशक तक जारी रहने की उम्मीद है। आयुर्वेद कंपनियों को पारंपरिक आयुर्वेद कंपनियों जैसे बैद्यनाथ, एआईएमआईएल, धूतपापेश्वर इत्यादि के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है, इसी के साथ उपभोक्ता की अगुवाई वाली एफएमसीजी कंपनियां जैसे डाबर, इमामी और हिमालया जैसी अनुसंधान द्वारा समर्थित वेलनेस कंपनियां भी इस क्षेत्र में हैं।

आनंद योरस्टोरी को बताते हैं, “महर्षि आयुर्वेद वेलनेस ज़ोन में आती हैं क्योंकि कंपनी अपने उत्पादों और सेवाओं को मजबूत अनुसंधान के साथ-साथ अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रमाणित प्रक्रियाओं के साथ बनाती है। यह एक आयुर्वेद कंपनी को अतिरिक्त मूल्य देता है और यह हमारा विभेदक है। हम अपने आयुर्वेदिक ग्रंथों से प्रेरणा लेते हैं लेकिन अपने उत्पादों को सबसे आधुनिक प्रारूपों में पेश करते हैं।”

उनका कहना है कि सबसे बड़ी चुनौती आपूर्ति श्रृंखला की है और आयुर्वेद व्यवसाय के रूप में कंपनी देश के विभिन्न हिस्सों से जुटाई जा रही कई जड़ी-बूटियों पर निर्भर है। किसानों से सामग्री एकत्रित करना भी इसी चुनौती का हिस्सा है। वर्षों से कंपनी ने कई किसानों को जैविक खेती के लिए प्रशिक्षित किया है। दूसरी बड़ी चुनौती ‘अंतरराष्ट्रीय नियामक’ है। आयुर्वेद पश्चिमी दुनिया में ‘फूड सप्लीमेंट सेगमेंट’ के अंतर्गत आता है। यह अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में विकास को प्रतिबंधित करता है।

आगे का रास्ता

कंपनी की भविष्य की संभावनाओं के बारे में बात करते हुए, आनंद कहते हैं कि आयुर्वेद एक लगातार बढ़ने वाला उद्योग है। कंपनी किसानों को प्रशिक्षित करने और गुणवत्ता वाले कच्चे माल की आपूर्ति करके बढ़ती जड़ी बूटियों में उनका समर्थन करने के लिए नोडल केंद्र स्थापित करने की भी योजना बना रही है। इसमें कहा गया है कि यह कदम किसान की आय पैदा करने में मदद करेगा। आगे बढ़ते हुए, महर्षि आयुर्वेद ने डिजिटल चैनलों पर ध्यान केंद्रित करने के साथ एक प्रत्यक्ष-से-उपभोक्ता चैनल विकसित करने की भी योजना बनाई है।

आनंद श्रीवास्तव, संस्थापक, महर्षि आयुर्वेद

(आनंद श्रीवास्तव, संस्थापक, महर्षि आयुर्वेद)

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