Nation pays tribute to Major Dhyan Chand on his 114th birth anniversary –  Mysuru Today

मेजर ध्यानचंद भारतीय हॉकी खिलाड़ी थे, जिनकी गिनती श्रेष्ठतम कालजयी खिलाड़ियों में होती है। मानना होगा कि हॉकी के खेल में ध्यान चन्द ने लोकप्रियता का जो कीर्त्तिमान स्थापित किया, उसके आसपास भी आज तक दुनिया का कोई खिलाड़ी नहीं पहुँच सका।

मेजर ध्यान चन्द रात में भी बहुत अभ्यास करते थे, इसलिए उन्हें उनके साथी खिलाड़ियों द्वारा उपनाम ‘चांद’ दिया गया। दरअसल, उनका यह अभ्यास चांद के निकल आने पर शुरू होता था। 1979 में दादा ध्यानचंद की कोमा में जाने के बाद मौत हुई, लेकिन जब तक वे होश में रहे, भारतीय हॉकी के प्रति चिंतित रहे।

हॉकी के जादूगर दादा ध्यानचंद का जन्म प्रयाग (इलाहाबाद) के एक साधारण राजपूत परिवार में 29 अगस्त, 1905 को हुआ। कालांतर में उनका परिवार इलाहाबाद से झांसी आ गया। उनके बाल्य-जीवन में खिलाड़ीपन के कोई विशेष लक्षण दिखाई नहीं देते थे। इसलिए कहा जा सकता है कि हॉकी के खेल की प्रतिभा जन्मजात नहीं थी, बल्कि उन्होंने सतत साधना, अभ्यास, लगन, संघर्ष और संकल्प के सहारे यह प्रतिष्ठा अर्जित की थी।

उनका जन्मदिन 29 अगस्त राष्ट्रीय खेल दिवस ‘राष्ट्रीय खेल दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। उनके चमत्कारिक खेल को देखकर अक्सर लोगों को संदेह हो जाता था कि कहीं उनकी हॉकी में चुंबक तो नहीं लगा हुआ है क्योंकि बॉल मानो उनकी हॉकी से चिपक जाती और वे गोल पर गोल करते चले जाते थे।

यह घटना 1936 के ओलंपिक हॉकी वर्ल्ड कप फाइनल की है। फाइनल में भारत का मुकाबला जर्मनी से था। इस मैच को देखने के लिए स्टेडियम 24000 से भी ज्यादा दर्शकों से भरा हुआ था। उस दिन विशेष रूप से जर्मनी के तानाशाह हिटलर भी स्टेडियम में मैच देखने के लिए मौजूद थे।

उस मैच में भारत ने जर्मनी को 07-01 से बुरी तरह हराकर ओलंपिक हॉकी का गोल्ड मैडल जीत लिया था। 07 गोल में से 03 गोल मेजर ध्यानचंद ने दागे थे। अपनी टीम की करारी हार को देखकर हिटलर बौखला गया था और मैच बीच में छोड़कर चला गया था।

उस रात हिटलर ने ध्यानचंद को अपने कमरे में बुलवाया और पूछा, “ध्यानचंद हॉकी खेलने के अलावा और क्या करते हो?”

मेजर ध्यानचंद ने उत्तर दिया, “सर! मैं भारतीय फौज में लांस नायक हूँ।”

इस पर हिटलर बोला, “ध्यानचंद, अपने देश को छोड़ दो और जर्मनी की तरफ़ से खेलो। देखो तुम्हारे देश ने तुम्हें क्या दिया है? अब भी सूबेदार ही हो। जर्मनी से खेलो मैं तुम्हें फील्ड मार्शल बना दूंगा।”

हिटलर के प्रस्ताव को ठुकराते हुए मेजर ध्यानचंद बोले, “सर, माफ़ कीजियेगा। आपका यह प्रस्ताव मैं स्वीकार नहीं कर सकता। मुझे आगे बढ़ाना मेरे देश की ज़िम्मेदारी नहीं है, बल्कि अपने देश को आगे बढ़ाना मेरी ज़िम्मेदारी है। इसलिए मैं तो अपने देश की ही तरफ़ से खेलूंगा।”

यह कह वह हिटलर के कमरे से चले आये। ऐसे देशभक्त थे हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद।