भूमिका
कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक भारत में अनेक प्रकार की विविधताएं हैं। अलग अलग धार्मिक मान्यताएं, भाषाएं, रीति रिवाज, पहनावा व खान पान होते हुए भी हम एक संस्कृति की डोर से बंधे हैं। भारत के इन क्षेत्रों में अलग-अलग प्रकार के खानपान हमारे लोगों की विविधता को इंगित तो करते ही हैं, परंतु इनमें भी प्रकृति प्रदत्त विभिन्न प्रकार के मसाले, जिन्हें आयुर्वेद में औषधी भी कहा जाता है, इनके स्वाद को पूरे भारतवर्ष में एक समान बनाते हैं। इन मसालों का प्रयोग ना केवल स्वाद के लिए आवश्यक है अपितु सेहत के लिए भी इनका प्रयोग करने की अपनी प्राचीन परम्परा है। वैसे तो प्रत्येक घर में बाजार से अलग अलग प्रकार के मसाले लाकर प्रयोग करने की आदत होती है। परन्तु इन अलग अलग मसलों के प्रयोग से कुछ सामान्य प्रयोग के मसाले बनाने वाले ऐसे ही एक प्रमुख उद्यम का नाम है MDH अर्थात महाशय दी हट्टी।

प्रारंभ
बहुधा हम सब ने दूरदर्शन व अन्य टीवी चैनल्स पर, अखबारों में तथा होर्डिंग्स पर एक 97 वर्षीय सदैव प्रसन्न दिखने वाले, पगड़ी धारी बुजुर्ग व्यक्ति का चित्र देखा होगा। इन आदरणीय सज्जन का नाम है महाशय धर्मपाल गुलाटी जो इस आयु में भी अपने पैतृक व्यवसाय एमडीएच के सारे काम की देखभाल स्वयं करते हैं। कंपनी में आज भी 80% हिस्सा उनका है और वर्ष 2017 में आप भारत के कॉरपोरेट जगत के सर्वाधिक वेतन प्राप्त करने वाले CEO थे। आपके पिता महाशय चुन्नी लाल गुलाटी ने अविभाजित भारत में सियालकोट में वर्ष 1919 में अपनी एक मसाला पीस कर बेचने के दुकान शुरू की। प्रारम्भ में ही यह उद्यम सफलता की सीढियां चढ़ता गया व MDH तथा देगी मिर्च वाले के नाम से लोकप्रिय होना शुरू हो गया। परन्तु स्वंत्रता प्राप्ति के पश्चात इस परिवार को भी अन्य लोगो के साथ अपना सब कुछ छोड़ कर अविभाजित भारत से विभाजित भारत में आना पड़ा। 27 सितंबर 1947 को ₹1500 के साथ महाशय धर्मपाल गुलाटी जी नई दिल्ली पहुंचे। आते ही उन्होंने एक तांगा खरीद कर चालना शुरू कर दिया। परन्तु उनका उद्यमी मन इस कार्य ज्यादा नहीं लगा व उन्होंने अजमल खान रोड, करोल बाग़ क्षेत्र में एक 14×9 फुट का लकड़ी का खोखा खरीद कर मसाले पीस कर बेचने का अपना पैतृक व्यवसाय प्रारम्भ कर दिया। धीरे धीरे कार्य विस्तार हुआ और वर्ष 1953 में दिल्ली के चांदनी चौक में एक दुकान किराए पर लेनी पड़ी। MDH यात्रा में महत्वपूर्ण पड़ाव तब आया जब 1959 में मसाले बनाने के लिए कारखाना लगाने हेतु दिल्ली में जमीन खरीद ली।

प्रारम्भ में हाथ से मसाला पीस कर बेचने वाली एमडीएच ने बाद में मशीनों के प्रयोग से मसाला पीस कर बेचना शुरू कर दिया। इससे न केवल मसलों की गुणवत्ता में सुधार हुआ अपितु मसाले बनाकर बेचने की प्रक्रिया में भी तीव्रता आई। आज MDH ने पूर्णतया स्वचालित 5 संयत्र दिल्ली, गुरुग्राम (हरियाणा) व नागौर (राजस्थान) में लगाए हुए हैं जहां गुणवत्ता की दृष्टि से मसाले बनाने की प्रक्रिया में मानव स्पर्श को बिल्कुल न्यूनतम कर दिया गया है। इन संयंत्रों के लिए कच्चा माल सीधे किसानों से, कर्नाटक व राजस्थान में अनुबंध कृषि के माध्यम से, खरीदा जाता है तथा ईरान व अफगानिस्तान से आयात किया जाता है। आज कंपनी की कुल उत्पादन क्षमता लगभग 30 लाख टन मसाले प्रतिदिन पीसने की है।

वर्तमान में MDH 62 प्रकार के मसाले 150 अलग अलग पैकेजेस में, 100 से अधिक स्टॉकिस्ट्स व 4 लाख रिटेलर्स के माध्यम से न केवल भारत के उपभोक्ताओं को उपलब्ध करवाती है वरन विश्व के 100 से अधिक देशों, जिनमें अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, यूरोप, दक्षिण पूर्वी एशिया, जापान, संयुक्त अरब अमीरात तथा सऊदी अरब प्रमुख हैं, को भी निर्यात करती है। दुबई व लंदन में कम्पनी के अपने ऑफिस स्थापित हैं।

सामाजिक योगदान
अपने सामाजिक उत्तरदायित्व का निर्वहन करने हेतु कम्पनी ने 20 विद्यालय स्थापित किए हैं जिनमें MDH अंतरराष्ट्रीय विद्यालय, महाशय चुन्नी लाल सरस्वती शिशु मंदिर, माता लीलावती कन्या विद्यालय प्रमुख हैं, स्थापित किए हैं जिनमें समाज के गरीब वर्ग के बच्चों को उच्च गुणवत्ता परक शिक्षा प्रदान की जाती है। इनके अतिरिक्त कम्पनी ने वर्ष 1975 में 10 बिस्तरों का आंखों का अस्पताल सुभाष नगर नई दिल्ली में शुरू किया। इसके बाद वर्ष 1988 में जनकपुरी में 20 बिस्तरों का अस्पताल प्रारंभ किया। अब आधुनिक सुविधाओं से युक्त 300 बिस्तरों का अस्पताल भी समाज के लिए कार्य कर रहा है। इन सब के अतिरिक्त कम्पनी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) महाशय धरमपाल गुलाटी निर्धन कन्याओं के विवाह के कार्यक्रमों में मूक दानदाता के रूप में अग्रणी भूमिका निभाते हैं। आज MDH भारत के मसाला उद्योग में दूसरे स्थान पर है तथा एक सफल स्वदेशी उद्यम का उदाहरण है।

Source: mdhspices.com