राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक परम पूज्य श्री माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर उपाख्य श्री गुरुजी का सम्पूर्ण जीवन लाखों हिन्दू युवकों के लिए प्रेरणादायक था, जो उनकी एक आवाज पर अपना पूरा जीवन देश और समाज की सेवा में समर्पित करने को उद्यत हो गये। उनके बारे में कार्यकर्ताओं के अनेक प्रेरक प्रसंग हैं, जिससे श्री गुरुजी के व्यक्तित्व के एक विशेष आयाम का पता चलता है।

उनका जन्म फाल्गुन मास की एकादशी संवत् 1963 तदनुसार 19 फ़रवरी 1906 को महाराष्ट्र के रामटेक में हुआ था। वे अपने माता-पिता की चौथी संतान थे। उनके पिता का नाम श्री सदाशिव राव उपाख्य ‘भाऊ जी’ तथा माता का नाम श्रीमती लक्ष्मीबाई उपाख्य ‘ताई’ था। उनका बचपन में नाम माधव रखा गया पर परिवार में वे मधु के नाम से ही पुकारे जाते थे। पिता सदाशिव राव प्रारम्भ में डाक-तार विभाग में कार्यरत थे परन्तु बाद में उनकी नियुक्ति शिक्षा विभाग में 1908 में अध्यापक पद पर हो गयी।

एक बार एक जगह संघ शिविर लगा हुआ था। श्री गुरुजी शिविर में आये हुए थे। जब एक दिन जलपान का समय हुआ तो श्री गुरुजी भी अन्य स्वयंसेवकों के साथ जलपान के लिए बैठे। सामग्री वितरण का कार्य स्वयंसेवकों की टोलियों के हाथों में था। जब वितरण प्रारम्भ हुआ, तो श्री गुरुजी ने देखा कि टोली का एक स्वयंसेवक चुपचाप बैठा है। श्री गुरुजी ने उससे पूछा- ‘तू क्यों बैठा है? वितरण कर।’ पर वह दृष्टि नीची किये चुपचाप बैठा रहा, जैसे उसने कुछ सुना ही न हो।

तब श्री गुरुजी ने प्रश्नवाचक दृष्टि से उस टोली के एक अन्य स्वयंसेवक की ओर देखा, तो उसने बताया कि वह स्वयंसेवक अछूत समझी जाने वाली महार जाति का है, इसलिए जलपान वितरण में संकोच कर रहा है। यह जानकर श्री गुरुजी को बड़ा क्रोध आया। उन्होंने उस स्वयंसेवक के पास जाकर डाँटकर कहा- ‘तूने संघ में यही सीखा है?’ यह कहते हुए उन्होंने जलेबी की थाली उस स्वयंसेवक के हाथों में लगभग जबर्दस्ती पकड़ायी और कहा- ‘सबसे पहले मेरी पत्तल में रख।’

वह बेचारा स्वयंसेवक रोता जाता था और वितरण करता जाता था। उसकी आँखों से गंगा-यमुना बह रही थीं, जैसे युगों-युगों का भेदभाव गलकर निकल रहा हो।

इस घटना के बाद संघ के किसी शिविर या कार्यक्रम में छूआछूत का कोई प्रसंग कभी उपस्थित नहीं हुआ। कार्य शब्दों से अधिक मुखर होते हैं (Actions speak louder than words), यह घटना इस सत्य को प्रकट करती है। श्री गुरुजी का पूरा जीवन अपने ही उदाहरण द्वारा समाज की बुराइयों को दूर करने की प्रेरक घटनाओं से भरा हुआ था।

श्री गुरूजी ने चीनी आक्रमण शुरू होते ही जो मार्ग दर्शन दिया उसके परिप्रेक्ष्य में स्वयंसेवक युद्ध प्रयत्नों में जनता का समर्थन जुटाने तथा उनका मनोबल दृढ करने में जुट गए। उनके सामयिक सहयोग का महत्व पण्डित नेहरू को भी स्वीकार करना पड़ा और उन्होंने सन् 1963 में गणतंत्र दिवस के पथ संचलन में कुछ कांग्रेसियों की आपत्ति के बाद भी संघ के स्वयंसेवकों को भाग लेने हेतु आमंत्रण भिजवाया। संघ के तीन हजार गणवेषधारी स्वयंसेवकों का घोष की ताल पर कदम मिलाकर चलना उस दिन के कार्यक्रम का एक प्रमुख आकर्षण था।

आज उनकी पुन्य तिथि पर समस्त समाज उनका आभारी है और सदैव उनको नमन करता है।