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1.अकेला पौधा 2.अपनों के साथ पौधा

पिछले साल जब मैं एक कार्यक्रम में गया तो मुझे वहां पर एक पौधा भेंट किया गया। मैंने वह लाकर कार्यालय पर नीचे दे दिया, बाकी गमलों के साथ वह भी रखा गया। अभी 15 दिन पहले जब मैं बाहर से आया और ऊपर सीढ़ियां चढ़ने लगा तो मेरी निगाह उस छोटे गमले पर गई। पूरा खिला हुआ, हरी पत्तियां, बहुत सुंदर लगा!

मुझे लालच आ गया। तो मैंने कार्यालय के मनोज को कहा “इसको उठा कर मेरे कमरे में ले आओ।”
और कमरे में एक सुंदर जगह पर मैंने उसको सजा दिया। उसको हवा, पानी, धूप यह सब लगे, इसकी मैंने व्यवस्था की। स्वयं मैं पानी देता था। किंतु पांच-छह दिन से देख रहा था कि वह कुछ मुरझाने लगा है, पत्ते सूखने लगे हैं।

मैं थोड़ा हैरान व परेशान होने लगा। फिर मैंने माली से बात की “मैं इस पौधे को स्वयं पानी देता हूं, खिड़की खुली रखता हूं, ताकि हवा व धूप आए, फिर भी यह कुम्हलाह क्यों रहा है?”

पहले तो उसने देखा तो उसको कुछ समझ नहीं आया। किंतु बाद में वह बोला ‘बाबूजी! यह पौधा अकेला है या तो कोई एक दो पौधे इसके साथ लाकर रखो या फिर बीच-बीच में इसको नीचे सबके साथ रखो, बिल्कुल अकेला पौधा मुरझा ही जाता है।”

मैंने दोपहर में ही मनोज को बुलाया और उस पौधे को वापस सब गमलों के बीच में रखने के लिए कह दिया। किंतु मैं यह विचार करने लगा की परिवार, समाज में रहकर ही कोई फलता फूलता है। अकेले में रहकर तो कितना भी अच्छा पौधा हो, कितनी भी अच्छी धूप पानी दी जाए वह मुरझा ही जाएगा।
यह बात हम सब पर, हमारे परिवार, समाज, संगठन, सब पर लागू होती है। सबके साथ मिलकर चलने में ही खुशहाली व फलना फूलना होता है, क्यों क्या कहना है आपका?