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आज कश्मीरी लाल जी व मैं वृंदावन गए हुए थे। वहां पर मेरे मित्र जो जम्मू में मेरे साथ प्रचारक रहे थे, राम गोपाल जी मिलने के लिए आए।
राम गोपाल जी, जब मैं जम्मू में विभाग प्रचारक था, उस समय महानगर प्रचारक थे। 2001 में उन्होंने वापस लौटने की सोची।

पर चिंता एक बात की थी कि वापिस जाकर कमाई क्या करेंगे? क्योंकि वे केवल बी.ए. पास थे। जब चर्चा निकली तो उन्होंने कहा “सतीश जी! मैं कोई नौकरी नहीं करना चाहता, कोई काम करूंगा। पर मेरे पास पैसे नहीं है। कोई नया आईडिया हो तो बताओ?”

उन दिनों पंजाब में न्यूरोथैरेपी से कमाई करने का एक प्रकल्प, जयदेव जी, सेवा भारती के माध्यम से चला रहे थे।
राम गोपाल जी को विचार जम गया। वह मुंबई जाकर 6 महीने का प्रशिक्षण लेकर आए, और फिर जुट गए। शुरुआत में दिक्कतें बहुत आई।दिल्ली में पैर जमाना आसान नहीं था। पर उन्होंने हिम्मत से काम लिया। 5-6 लड़को को वही काम सिखा कर अपनी टीम बनाई, आरोग्य कैम्प लगाए। बहुत मेहनत की। जब पैसे ज्यादा नही बन रहे थे तब भी घबराये नहीं।

आज मिले तो मैंने पूछा “तुम्हारे पास कितने लड़के काम करते हैं?”
वे बोले “38 लोगों को मैंने इस समय पर सीधे अपने पास काम दे रखा है।”

मैं सुनकर हैरान हो गया फिर मैंने पूछा “प्रत्येक कितनी कमाई कर लेता है?”
राम गोपाल जी ने कहा “हर एक कम से कम ₹30,000 कमा लेता है।”

मैंने पूछा “इसके अलावा भी कोई तुम्हारे से रोजगार पाए हैं?”
तो वह बोले “मैंने प्रशिक्षण दिया और अब अपना काम कर रहे हैं ऐसे लगभग 300 न्यूरो थेरेपिस्ट हैं।”

उन्होंने कहा कि सतीश जी मैंने आपको कहा था “नौकरी करूंगा नहीं नौकरियां दूंगा।”
“और वह भी बिना पैसे के!” मैने मज़ाक में कहा, उन्हें शाबाशी दी। क्योंकि इन 20 सालों में उन्होंने यह सिद्ध कर दिखाया था।

और मुझे स्वदेशी चिट्ठी लिखने की आज की सामग्री मिली।