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बहुत हिम्मत करके आज शाम 7:00 बजे रतन जी से (रोहित सरदाना के पिताजी) से फोन कर पाया।
फोन क्या? बस इतना ही बोल पाया, “मैं सतीश बोल रहा हूं…उधर से रतन जी कहते रहे, हां! हां! सतीश जी बोलो?”
…पर मेरे मुंह से आवाज नहीं, आंखों से आंसू ही निकल रहे थे। 1993-94 में जिस रोहित को प्राथमिक वर्ग कराया, उसको कुरुक्षेत्र के गीता स्कूल की शाखा का मुख्य शिक्षक बनाया, जिसे अक्सर सरदाना जी भेजते थे कार्यालय पर, “जा वहां सतीश जी, विभाग प्रचारक ने भोजन नहीं किया होगा, उन्हें बुला ला।”
और वह मुझे आग्रह पूर्वक ले जाता था।
आज उसी रोहित को श्रद्धा सुमन अर्पित करने का विचार ही मुझे रुला व कंपा दे रहा था। पिताजी विभाग के बौद्धिक प्रमुख थे, गीता विद्यालय में प्रधानाचार्य थे। तीन भाई, एक बहन चारों स्वयंसेवक। और जिन्होंने स्वयंसेवक तत्व को चरितार्थ किया…
ऐसे अपने रोहित चले गए। दत्तोपंत ठेंगड़ी जी ने अपने एक भाषण में कहा था, “Not the longivity but the quality of life, decides his/her greatness”
कोई 84 साल जी कर भी कोई कुछ खास नहीं कर पाते और यहां हमारा रोहित 42 वर्ष की आयु में ही सारे देश में राष्ट्रवादी, निर्भीक पत्रकारिता का प्रेरक पुंज बन गया। लाखों को प्रेरणा दे गया, लाखों को रुला गया…बस रोहित! इससे ऊपर और नहीं लिखा जा रहा।
हम सबको तुझ पर नाज है, और रहेगा!
~ सतीश