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कल शाम मैं गुरुग्राम से हिमाचल में सुंदरनगर के लिए निकला,वहां हिमाचल प्रांत की बैठक है।
करनाल में प्रोफेसर चौधरी के घर भोजन के लिए रुके तो वहां पर अपने जिला संयोजक दुलीचंद जी मिलने के लिए आए।
मैंने सहज रूप से पूछा “कहिए दुलीचंद जी! कैसा चल रहा है?” दुलीचंद जी मुस्कुराते हुए बोले “बहुत बढ़िया है। और मेरा तो स्थानांतरण भी अब नजदीक हो गया है।”(वे अध्यापक हैं)” मैंने सुखद आश्चर्य से पूछा “अच्छा! कहां,कैसे हुआ?”
तो उन्होंने कहा “अब तो मैं घर से केवल 5 किलोमीटर पर आ गया हूं।और किसी से कोई सिफारिश नहीं करवाई।आजकल जरूरत ही नहीं पड़ती।”
वे आगे बोले “5-6 साल पहले की सरकारों में तो इतनी ट्रांसफर करने के लिए ही ₹50000 तक लग जाते थे।और उस पर भी यह विश्वास नहीं होता था कि 2 महीने बाद कोई और ट्रांसफर न करवा ले।”
मैंने कहा “मतलब?” दुलीचंद जी आगे बोले “और सवाल केवल पैसे का या दिक्कत का नहीं था सतीश जी!जो आत्म सम्मान खोना पड़ता था, कि जब किसी एमएलए को जाकर हम कहते थे कि मेरा ट्रांसफर करा दो तो वह सबके बीच में व्यंग करता था ‘अरे तेरे गांव से तो मुझे वोट ही नहीं मिले थे, तब तो तुम कभी आए नहीं,आज यहां क्या करने आए हो?और अपमान का घूंट पीना पड़ता था क्योंकि अपना स्थानांतरण आदि करवाना होता था। पैसे भी देते थे,आत्म सम्मान भी गंवाते थे,हम लोग।”
“किंतु अब तो बहुत ही अच्छा है।जबसे हरियाणा में यह सरकार और मुख्यमंत्री मनोहर लाल जी आए हैं ना,तो प्रत्येक नियुक्ति और प्रत्येक स्थानांतरण, बिना किसी पैसे, बिना किसी सिफारिश के, सिस्टम से व कंप्यूटर से हो जाते हैं। प्रदेश की जनता केवल इसी बात से ही बहुत प्रसन्न है।”
मैं सोच में था कि यदि ईमानदार नेतृत्व हो तो कैसा फर्क पड़ जाता है। …शाखा का घणा रगड़ा लाग्या है,
मनोहर लाल ताईं…अपणा पक्का स्वयंसेवक सै!