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स्मारक पर भ्रमण के समय का चित्र

पुष्कर(राजस्थान)की बैठक के बाद आज भीलवाड़ा के कार्यकर्ताओं के साथ दिवेर भ्रमण का कार्यक्रम था। वहां के संघचालक नारायण लाल जी से मैंने पूछा “इस विजय स्मारक का क्या महत्व है?
तो उन्होंने बताया हल्दीघाटी के महान संग्राम के बाद महाराणा प्रताप वहां से निकलकर इस क्षेत्र में आ गए।1583 में जब वह काफी कठिनाई के दौर में गुजर रहे थे,तब भामाशाह अपने साथ बहुत बड़ा धन लेकर आ गए। जोकि 5000 की सेना को भी 12 वर्ष तक लड़ने के लिए पर्याप्त था। उसके आधार पर ही महाराणा प्रताप ने फिर से एक बड़ी सेना का गठन किया।
…और दिवेर नामक स्थान पर,जहां अकबर की तरफ से उस समय पर सुल्तान खान मोर्चा संभाल रहा था, एक भयंकर युद्ध किया। महाराणा प्रताप के पुत्र अमर सिंह जो 23 वर्ष के थे, वे सीधे सुल्तान खान से जा भिड़े और तेजी से भाला उसकी छाती में भोंक दिया वह वही लहूलुहान होकर गिर गया। बाकी की मुगल सेना दौड़ गई। अब प्रताप के कहने पर अमर सिंह ने ही उसकी छाती से भाला निकाला उसके मुंह में गंगाजल डाला ताकि वह ठीक से मृत्यु को प्राप्त हो।

दिवेर युद्ध के विजई होते ही, प्रताप की सेना ने चारों तरफ की चौकियों को मुक्त कराया और इस प्रकार बड़ा मेवाड़ का क्षेत्र, मुगलों से मुक्त हुआ। 57 वर्ष की आयु में प्रताप स्वर्गवासी हुए।उन्होंने अधिकांश मेवाड़ को मुक्त करा लिया था किंतु चित्तौड़गढ़ किला मुक्त नहीं हुआ।हल्दीघाटी के युद्ध के बाद महाराणा प्रताप ने प्रतिज्ञा की “जब तक मेवाड़ को मुक्त नहीं करा लूंगा,तब तक सोने चांदी के बर्तन में भोजन नहीं करूंगा। पलंग पर सोऊंगा नहीं।किसी प्रकार की सुख सुविधा का उपयोग नहीं करूंगा।”
इसी महान प्रतिज्ञा के कारण ही प्रताप, महाराणा प्रताप कहलाए व आगामी पीढ़ियों के लिए प्रेरणा के स्रोत बन गए।
यह सब कथा सुनाते हुए नारायण लाल जी खुद तो भावुक हो ही गए, कथा सुनते सुनते हमारे में से भी अनेक लोगों की आंखों में आंसू आ गए।