भोपाल में स्वदेशी दिवस

तब मैं छटी कक्षा में पड़ता था! कारण मेरी समझ से परे था- शनिवार का दिन था! सवेरे मैं स्कूल जाने की जल्दी में था! बाहर “शनि को मनाए सदा सुख पाए…” बोलने वाला भिक्षा माँग रहा था! माँ के दो बार कहने पर भी मैं तेल की कटोरी उसे देने बाहर नहीं गया था।मैं कह रहा था “आप ही दे दो..मेरे पास टाईम नहीं।” ~ बहुत वर्ष बाद मुझे समझ आया कि माँ को केवल शनिदेवता को तेल ही नही देना था, उसे मेरे में,’घर आए को कुछ देना ही है’-यह संस्कार भी डालना था। माँ सवेरे रोटी बनाती तो पहली छोटी रोटी कुत्ते की, दूसरी गाए की फिर तीसरी हमारे लिए…छत पर पंछियों के लिए पानी व कभी-कभी बाजरा डालना सामान्य आदत थी…आज पूना जाते हुए एक स्टेशन पर पंछियों का समूह देखा(जो आजकल दुर्लभ हो गया है)तो पिछली यादें उभर आईं…आजकल माताएँ बच्चों को दान के, पशु पक्षियों को दाना डालने के संस्कार देती है क्या?…मेरा प्रश्न है??…