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यह 55 वर्ष पुराने नागरिकता कानून में आठवां संशोधन है। जिसमें की बाहर के देशों के नागरिकों को (जो वहां से उत्पीड़ित हैं) भारत में नागरिकता देने संबंधी है। अभी के संशोधन में यह जोड़ा गया है की 31 दिसंबर 2014 से पूर्व आए हुए हिंदू, सिख, पारसी ईसाई,बौद्ध यदि बांग्लादेश,अफगानिस्तान व पाकिस्तान में उत्पीड़ित हैं, वाह अब भारत में रह रहे हैं, तो वे भारत के नागरिक बन सकते हैं।

*क्योंकि यह तीनों देश मुस्लिम देश हैं अतः वहां से मुस्लिम तो पीड़ित होंगे नहीं,अन्य ही पीड़ित हैं इसीलिए उन्हीं के लिए यह प्रावधान किया गया है। प्रश्न:इतना विरोध क्यों हो रहा है?

उत्तर: देशभर में तो कांग्रेस और सेकुलरी तंत्र, इसे संविधान की भावना के विपरीत बता रहा है क्योंकि मुस्लिमों को नहीं जोड़ा गया है।

किंतु आसाम व ऊपर के राज्यों में यह अनुचित धारणा है की इससे बंगाली हिंदू बड़ी संख्या में वहां पक्के नागरिक बन जाएंगे और उनके संसाधनों का उपयोग कर लेंगे।

प्रश्न:सरकार का क्या कहना है?

उत्तर: सरकार का कहना है कि असम के बाकी के राज्यों में तो इनर लाइन परमिट है,वहां यह बिल लागू ही नहीं होता। आसाम में भी जो ट्राइबल क्षेत्र है उसमे लागू नहीं होता बाकी आसाम में अगर हिंदू रहता भी है,तो क्या हर्ज है?

दूसरा यह संविधान की भावना के अनुरूप ही है। क्योंकि पाकिस्तान में 1947 में 23% हिंदू थे जो अब घटकर 3.2% रह गए हैं। बांग्लादेश में 26% थे जो अब घटकर 8.2% रह गए हैं।और भारत के मुसलमानों से किसी प्रकार का भेदभाव इसमें नहीं है। फिर घुसपैठियों और उत्पीड़ित शरणार्थियों में अंतर तो स्वभाविक है। गैर मुस्लिम वहां उत्पीड़ित हैं इसीलिए तो नागरिकता देने की जरूरत पड़ रही है। **एक और स्पष्टीकरण: पहले भी हर 12 वर्ष में ऐसे लोगों को नागरिकता दी जाती है इस बार 5 वर्ष बाद ही यह दी जा रही है बस इतना ही जोड़ा है।

प्रश्न:इस कानून का भविष्य क्या है?

उत्तर: पूरे देश में जन जागरण के माध्यम से इसको सर्वस्वीकार्य करवाना है। विरोधी लोग सुप्रीम कोर्ट में जाएंगे पर सरकार पूरे होमवर्क के साथ यह नया कानून लाई है इसलिए यह सफल भी होगा ही।

निष्कर्ष:भारत को हिंदू समाज अपने घर की तरह दिखता है उसका दुनिया में और कोई ठिकाना नहीं यदि वह वहां परेशान है तो वह भारत आकर नागरिकता मांगता है, इसलिए यह भारत का नैतिक कर्तव्य भी है जिसे यह सरकार पूरा कर रही है।