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कुछ दिन पहले कश्मीरी लाल जी और मैं फरीदाबाद में संतोष बहन जी के यहां गए। यद्यपि राखी तीन-चार दिन पहले निकल चुकी थी तो भी राखी तो बंधवानी थी। संतोष बहन जी ने हम दोनों को राखी बांधी। तभी उन्होंने अपनी पोत्री जो केवल आठ साल की है,उसको बुलाया। और उसको कहा “मामा जी को राखी बांधो!”

बच्ची थोड़ी शर्मा रही थी। किंतु उन्होंने उसके हाथ में राखी दे दी “चल बांध!” उसको बांधना नहीं आ रहा था तो बहन जी उसके ही हाथ से राखी बंधवाने की कोशिश करने लगी।

मैंने कहा “कोई बात नहीं, छोड़ दो इसको!”
पर बहनजी कहने लगी ‘नहीं,नहीं! इसको बांधनी चाहिए। इसको ध्यान में रहना चाहिए की राखी का त्यौहार है, कैसे मनाना चाहिए।”

तभी मेरे को अपने बचपन की एक घटना याद आई। जब मैं शायद छठी कक्षा में पढ़ता था। शनिवार सवेरे का दिन था। शनि देवता तेल मांगने के लिए आया तो मां ने रसोई में से मुझे आवाज दी “सतीश! शनि देवता आया है। मेरे से तेल की कटोरी ले जा और उसे दे दे।”

मैं स्कूल जाने की तैयारी कर रहा था इसलिए कहा “मां! आप ही दे दो!” मां ने फिर से कहा “नहीं नहीं! यह तेरे को ही करना है।”

जब मैंने अनसुना कर दिया तो मां थोड़े गुस्से में उठी। तेल कटोरी में डाला मेरे पास आई। मेरा हाथ पकड़ कर लगभग घसीटते हुए उसके पास ले गई और मेरे हाथ से ही तेल उसकी बाल्टी में डलवाया।

तब तो मुझे कुछ समझ में नहीं आया सिवाय इसके की मां बेकार में ही जिद मारती है। अपने आप ही क्यों नहीं दे दिया?
किंतु आज समझ में आता है वास्तव में मां मेरे को संस्कार डाल रही थी। मां को तेल दान करने से भी ज्यादा इस बात का ध्यान था कि मेरे बेटे को दान देने की आदत लगनी चाहिए। क्या हम बच्चों में ऐसे छोटे-छोटे संस्कार डालने का ध्यान रखते हैं? ज़रा सोचिए !

~सतीश कुमार