शिवाजी महाराज के एक प्रमुख सेनापति थे, तानाजी मालसुरे! संयोग से जब तानाजी अपने पुत्र सूर्याजी के विवाह हेतू गांव गए हुए थे, तो कोण्डाना किले को जीतने की योजना बन गई! वह किला बहुत दुर्गम था,
शिवाजी की सूचना पाकर तानाजी विवाह कार्य छोड़ युद्ध हेतू तैयार हुए! तब सूर्या ने कहा “मैं भी पिताजी के साथ चलूंगा! विवाह अब बाद में देखेंगे!”
कोण्डाना दुर्ग अति कठिन था! रस्सियों के सहारे अमावस्या की रात्रि में सब किले पर चढ़ गए! भयंकर युद्ध शुरू हो गया! क्योंकि दुश्मन सेनापति भी तलवार का बहुत धनी था और बहादुर भी! उसने चाल चली व सीधे आकर तानाजी से भिड़ गया! उफ! एक तलवार का सीधा वार तानाजी पर पड़ गया और वे शहीद हुए!
पहले से ही कठिन लड़ाई लड़ रही सेना को जब यह पता चला कि तानाजी ही मारे गए तो उसमें भगदड़ मच गई! जिन रस्सियों से चड़े थे उन्ही का उपयोग कर उतर भागने लगे!
यह देख सूर्याजी ने अपने एक विश्वस्त सैनिक को भेज सारी रस्सियां कटवा दीं! और सैनिकों को कहा “तानाजी की शहादत के बाद हम सब सेनापति हैं! किन्तु कोई डर कर भागा तो भी गिरकर बेमौत मरेगा! अब यही अच्छा है कि युद्ध करो और विजयी होवो! हम अभी एक मोर्चा हारे हैं,पर युद्ध हम ही जीतेंगें…क्योंकि हम इसी निश्चय से ही आए हैं!अपने निश्चय पर दृढ़ रहो,और विजय पाओ..दूसरा कोई विकल्प अब है ही नहीं!”
यह सब देख सुन सेना पल्टी!फिर घनघोर युद्ध शुरू हुआ! उधर शत्रु सेनापति भी जो तानाजी से ही युद्ध करते घायल हुआ था,चल बसा! वहां कोई बड़ा संभालने वाला भी न था! कुछ ही समय के युद्ब के बाद कोनडाना किले पर कब्जा करने में सूर्याजी सफल हुए!”
उस किले को शिवाजी ने सिंहगढ़ नाम दिया! वहां कहावत है “सिहं गया,गढ़ आया!”