केरल में प्रदर्शन का एक चित्र! केरल में ऐसे बीसियों प्रदर्शन हो रहे हैं!
गत कुछ दिनों से,केरल के अंदर लगातार सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ,महिलाओं द्वारा बड़ी मात्रा में प्रदर्शन चल रहे हैं!ज्ञात हो कि शबरी मलाई मंदिर में युवा महिलाओं के प्रवेश को अनुमति देकर सुप्रीम कोर्ट ने यह विवाद पैदा किया है!
आप लोगों को जानकारी रहे,केरल में त्रिवेंद्रम से 150 किलोमीटर दूर पंपा नदी के किनारे शबरी मलाई का प्रसिद्ध मंदिर है! कहते हैं कि मक्का मदीना से भी अधिक, याने दुनिया में सबसे अधिक श्रद्धालु यहां आते हैं!गत नवंबर से जनवरी मकर संक्रांति तक,केवल 3 महीनों में ही कोई पांच करोड़ श्रद्धालु वहां आए।
देवस्थान बोर्ड व सरकार का कहना है कि इससे केरल में इन 3 महीनों में ही 10,000 करोड़ का अर्थ चक्र चला। हजारों लोगों को रोजगार मिला।
यह शैव और वैष्णव संप्रदायों के मिलन का,एकता का,भी स्थान है!मोहिनी रूप विष्णु और शिव से उत्पन्न अय्यप्पा जो ब्रह्मचारी है, उसकी ही वहां मूर्ति है!और इस मंदिर की स्थापना स्वयं परशुराम भगवान ने की थी इसलिए वहां पर रजस्वला महिलाओं का प्रवेश वर्जित है। अन्यथा छोटी बच्चियां या बड़ी उम्र की महिलाएं तो जाती ही हैं।यह तर्क नहीं,श्रद्धाओं व आस्था का विषय हैं, कोई महिला अधिकार का विषय नहीं! कोई मूर्ख कल को तर्क दे सकता है,कि बच्चे के सिर पर हाथी का सिर लगा,शिव ने गल्त किया!
सवाल यह है कि आस्था,श्रद्धा के प्रश्नों में न्यायालय को पड़ना चाहिए क्या? और न्यायालय द्वारा क्या ऐसा ही फैसला,की मस्जिदों में भी महिलाओं को प्रवेश देकर किया जा सकता है क्या? संभव ही नहीं है! उचित भी नहीं है!
राजनीति, सामाजिक क्षेत्रों में तो अंग्रेजी मानसिकता,मैकाले की शिक्षा से जो उत्पन्न हुई अब समाप्त हो ही चुकी है! अब न्यायालय की बारी है! 3 वर्ष पूर्व तमिलनाडु में जैलीकट्टू को लेकर भी न्यायालय ने ऐसा ही उल्टा निर्णय दिया था। किंतु समाज ने स्वीकार किया नहीं। तो न्यायालय को झुकना पड़ा। इस विषय में भी ऐसा ही होगा।
अभी न्यायालय में अंग्रेजों के बनाए हुए कानून व उनकी बनाई शिक्षा का दृष्टिकोण यह अभी चल रहा है। काफी कुछ मुक्त हुआ है शेष इस अभियान में हो जाएगा! महिलाओं के नेतृत्व में केरल का हिन्दू समाज उबाल पर है,तो सारा देश भी केरल के साथ,भावात्मक रूप से,सुप्रीम कोर्ट के विचित्र निर्णय के खिलाफ खड़ा है! ….जय हो