आज सवेरे मैं बाल कटवाने के लिए कार्यालय के निकट वाले अपने परिचित नाई राम सिंह के पास गया! बाल कटवाते समय मैं सोच में था कि शेव करवाऊं क्या? इतनी देर में वह अपने बारे में बताने लगा “आजकल यहां नए दो तीन लड़के बैठ गए हैं!इसलिए कमाई बहुत कम हो रही है! वैसे तो मैं 500-600 रूपये कमा लेता था! किंतु आजकल केवल 250-300 ही कमा पाता हूं!”
तभी,गुरुजी का एक प्रसंग याद आते ही मैंने उसको कहा “मेरी शेव भी कर दो!” उसे थोड़ा आश्चर्य हुआ! क्योंकि मैं पहले केवल बाल ही उससे कटवाता हूं! खैर उसको तो ध्यान में क्या आना था किंतु आप को गुरु जी का वह प्रसंग बताता हूं!
गुरु जी याने संघ के दूसरे सरसंघचालक! वे कभी भी मनुष्य द्वारा खींची जाने वाली रिक्शा पर नहीं बैठते थे! इस पर एक कार्यकर्ता ने पूछा “फिर तो हमें भी नहीं बैठना चाहिए!” तो गुरुजी ने उससे कहा “नहीं!ऐसा कभी नहीं करना!तुम तो गृहस्थ हो,तुम्हारी बात अलग है रिक्शा का उपयोग आप लोगों को जरूर करना चाहिए बल्कि एक बात जरूर ध्यान रखा करो कि तुम यह अठन्नी,₹1 के लिए उससे भाव तोल करके,उसकी मजबूरी का फायदा कभी नहीं लेना चाहिए!यदि ऐसे आदमी को अठन्नी,रुपैया अधिक चला भी गया तो कोई बात नहीं!”
मुझे यह प्रसंग याद आते ही मैंने सोचा कि यदि वह 10-20 रू: मेरी शेव के अधिक ले भी लेगा तो मेरा तो कुछ जाएगा नहीं,मैं तो किसी कार्यकर्ता से भी 100-50 ले लूंगा किंतु इसका ठीक चलना चाहिए!”
ऐसे ही एक प्रसंग में पंडित दीनदयाल जी ने भी और लखनऊ कार्यालय के बाहर घुमा सैलून से कटिंग कराई! जब दीनदयाल जी कार्यालय आए तो उनकी खराब सी कटिंग देख कार्यकर्ता ने पूछा “कटिंग कहां से करवाई?” तो उन्होंने कहा कि गुम्मा सलून यानि आधी ईंट के ऊपर बैठकर जो सड़क के किनारे करते हैं,उससे!” तब दीनदयाल जी से कार्यकर्ता ने पूछा “आप इतने बड़े अधिकारी होकर उससे क्यों करवायी?” तो उन्होंने कहा “दो बातें हैं! एक तो इस गरीब को चार पैसे मिल जाएंगे!और दूसरा मुझे निचले स्तर पर लोग कैसे कमाते खाते हैं,इसकी जानकारी मिल जाएगी!” जिन्होंने जनसंघ की आर्थिक नीति लिखी ऐसे थे अपने पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी!
सेल्फी विद नाई? हां क्यों नहीं?